आँखों से जो दिख जाता

Photo by Masha Raymers from Pexels

आँखों से जो दिख जाता मिरे दिल का नासूर
आप बेवफ़ाई के तमगे से यूँ नवाज़ते नहीं
जो खेलते हैं ये दांव ख़ुद को कहकर मजबूर
वाहवाही के लिये महफ़िलों को यूँ सुनाते नहीं
इंसाफ के कटघरे में खड़ा कर गिनों मिरे क़सूर
बेक़सूर अपनी ज़िन्दगी की दास्तां यूँ बताते नहीं

आँखों से जो दिख जाता मिरे दिल का नासूर
आप मिरी तन्हाई का बोझ दो पल भी सह पाते नहीं

आँखों से जो दिख जाता मिरी तन्हाई का असबाब
आप बीते कल का बोझ कंधों पर यूँ चढ़ाते नहीं
असूया की आग में अकेले ही सुलगते जनाब
जज़्बातों के नाम पर यूँ तमाशा बनाते नहीं
भरी अदालत में दागो सवाल और माँगो जवाब
वरना सबूतों के अभाव में यूँ उंगली उठाते नहीं

आँखों से जो दिख जाता मिरी तन्हाई का असबाब
आप मिरी रूह का ज़ख़्म यादों से मिटा पाते नहीं

आँखों से जो दिख जाता मिरी रूह का हाल
आप इन पुराने घावों को हरा कर जाते नहीं
चार लोगों की बातों का वहम न पाये संभाल
वरना सनम पर ऐतबार कर एहसान जताते नहीं
बंद आँखों से कुरेदते हो बिना किये मिरा ख़याल
आप मोहब्बत के नाम पर यूँ सितम ढाते नहीं

आँखों से जो दिख जाता मिरी रूह का हाल
आप ये ज़ुल्मत भरी ज़िन्दगी काट पाते नहीं

एक बार जो दिख जाता फ़िर करते मलाल
आप आसानी से ये नज़ारा भुला पाते नहीं

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply