आवाज़ें

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मैं अकेली नहीं हूँ
ये आवाज़ें हैं ना
रात के सन्नाटे में
धीरे से कान में
फुसलाकर
मुझे नाम लेकर
पुकारा करती हैं

अक्सर मेरे कमरे से
आते शोर को सुन कर
चौंक मत जाना दोस्त
तन्हाई में ये आवाज़ें
मुझसे गुफ़्तगू कर
कभी कभार किस्से
सुनाया करती हैं

श: अपने होंठों पर
ज़रा उंगली रखना
तुम्हारे क़रीब आने
की आहट मात्र से ही
ये हड़बड़ाकर झट से
कमरे में कहीं छिप
जाया करती हैं

जब तुम कहीं दूर
जाते हो और मेरे
मन में ख़यालों का
मकड़जाल उलझता
ही चला जाता है
तो यही तो साथ
निभाया करती हैं

मेरे भीतर कुछ बदल रहा है

अभी कुछ दिनों से
इनका मिज़ाज़
कुछ ठीक नहीं
कभी क्रोधाग्नि से
झुलसा जाती हैं
तो कभी बिन मौसम
ही बरस जाती हैं

इनका ख़यालों में
आ कर ठहरना
तो ठीक था मगर
न जाने आजकल
बेवज़ह ही मेरे
ख़्वाबों में भी
दस्तक दे जाती हैं

एक सौ बीस घन्टे
बीत गए बिना सोये
तब से बस इनके ही
फ़साने सुन रही हूँ
अब मेरे टोकने पर भी
रुकती नहीं वही बातें
दोहराती जाती हैं

मेरे भीतर कुछ बदल रहा है

घबराहट होने लगी है
अब उनकी दस्तक देने
की आदत बदलने लगी है
आये रोज़ इनका मेरी
उत्कंठा की आग को
यूँ सुलगाना अब
मुझे खलने लगा है

बातों के सिलसिले की
जगह अब षड़यंत्र रचे
जाने लगे हैं और इनका
दख़ल अब मेरी निजी
ज़िन्दगी में पड़ने लगा है
ऐसे नींद से बैर मोल लेना
मुझे खलने लगा है

मेरे भीतर कुछ बदल रहा है

मैं अकेली नहीं हूँ
ये आवाज़ें हैं ना
जो दबी ज़ुबान से
बात करती थीं अब
मेरे सामने नज़रें
उठाने लगी हैं
मेरी आवाज़ को
शोर में दबाने लगी हैं

मेरी कहानी को
अपना बनाने लगीं हैं
मेरी पहचान को
मुझसे चुराने लगीं हैं
बात सिर्फ़ हावी होने
की होती तो ठीक था
मग़र वो तो मालिकाना
हक़ जताने लगी हैं

राज़ की बात है दोस्त
मेरे हाथ में चाकू देख
तुम घबरा मत जाना
ये आवाज़ें मुझे शांत
कर दे इससे पहले मैं
इन्हें मिटा देना
चाहती हूँ, बस

मैं इतने वक़्त से
अकेली नहीं हूँ और
अब अकेला होना
चाहती हूँ, बस

मेरे भीतर कुछ बदल
रहा है और मैं उस
बदलाव को रोकना
चाहती हूँ, बस

© अपूर्वा बोरा​

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