अफ़साने

सिसकियों की गूँज है सिरहाने मेरे
लफ़्ज़ों में सिमटते नहीं हैं फ़साने मेरे

बैर मोल लिया है नींद के पहरेदारों से
वो आती नहीं अब स्वप्न सजाने मेरे

सुकून तलाशती है बंजारन ज़माने में
कितने अरसे से वीरान हैं काशाने मेरे

मुस्कुराने में बिता दिया सारा बचपन
अब जवानी गिनाती है कर्ज़ पुराने मेरे

तन्हाई का रंज हो तो भी किससे कहें
जब मुक़म्मल ही न हो सके याराने मेरे

हाथ थामने की बात करते हैं अक़्सर
मग़र साथ निभाने से घबराते हैं दीवाने मेरे

अपनों पर ऐतबार की भूल हुई थी
अब गैरों में बसते हैं आशियाने मेरे

कोशिश करने वाले हार मान चुके हैं
ज़िन्दगी भी ठुकराती हैं नज़राने मेरे

मुझे तुम कहानीकार न समझना
जब हालात ही बुनते हैं ताने-बाने मेरे

चित व्याकुल था कल और आज भी है
अब कहाँ बदलेंगें अफ़साने मेरे

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply