अगर मैं कहूँ

अगर मैं कहूँ
जिस रास्ते पर आज तुम खुद को अकेला समझ रहे हो
कल उसी राह से कोई और गुज़रा था
और कल भी कोई न कोई गुज़रेगा
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
जिस बग़ावत में आज खुद को अकेला समझ रहे हो
कल वही लड़ाई किसी और ने लड़ी थी
और कल भी कोई न कोई लड़ेगा
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
जिस अधूरेपन में आज खुद को खो रहे हो
कल उसी तन्हाई में कोई और भी खोया था
और कल भी कोई न कोई खोएगा
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
जिस हौसले को हथेली से फिसलता हुआ देख रहे हो
कल वही हिम्मत किसी और ने हारी थी
और कल भी कोई न कोई हारेगा
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
तुम अकेले नहीं हो
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
मैं तुम्हारे साथ हूँ
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

अगर मैं कहूँ
ये लड़ाई सिर्फ़ तुम्हारी नहीं
तो क्या तुम्हारा हौसला बढ़ेगा?

 © अपूर्वा बोरा

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