अजनबी

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राह से गुज़रते हुए अजनबी
तरुवर की शीतल छाया तले
ठहरते हैं कुछ देर के लिए
उतारते हैं कुछ तस्वीरें और
बढ़ जाते हैं अपने पथ पर
इस बात से बेख़बर कि

भोर तलक ओस की बूंदे इन
पत्तों पर नृत्य करती हैं फ़िर
सूरज की किरणें उनकी ओट
से लुकाछिपी का खेल खेलती हैं
कुछ बच्चे दोपहर में उसकी शाखा
पर रस्सी का झूला डाल झूलते हैं
तो एक दीवाना अपनी प्रेमिका की
गोद में कभी सिर रख उसकी ज़ुल्फों
की पनाह में ज़माने को भुलाता है और
सांझ ढलते ही पँछी का एक जोड़ा
मुँह में अन्न दाबे घर लौट आता है

राह से गुज़रते हुए अजनबी
अक़्सर
बढ़ जाते हैं अपने पथ पर
इन सभी बातों से बेख़बर
.
.
राह से गुज़रते हुए अजनबी
पहाड़ की सर्पीली सड़कों पर
ठहरते हैं कुछ देर के लिए
उतारते हैं कुछ तस्वीरें और
बढ़ जाते हैं अपने पथ पर
इस बात से बेख़बर कि

सूरज से पहले जागते हैं पहाड़ी
यहां पहले स्त्रियाँ जल भरती हैं
डालती हैं चारा गौशाले में फ़िर
जहाँ गाय ख़ुशी से रंभाती है
कुछ बूबू धूप में हुक्का पीते हैं
एक बालिका स्कूल जाने के
लिए बाल बनाती है तो ये
बालक भी जूते चमकाते हैं
बुरांश से लदेगदे वृक्ष भी हवा के
झोंकों संग झूम लिया करते हैं और
अंगीठी की ताप से सर्द रातों में
मिट्टी से लीपे घर गर्म रहा करते हैं

राह से गुज़रते हुए अजनबी
अक़्सर
बढ़ जाते हैं अपने पथ पर
इन सभी बातों से बेख़बर
.
.
कभी आगे बढ़ तो कहीं ठहरकर
यूँ ही कट जाता है जीवन का सफ़र
राह से गुज़रते हुए हम अजनबी
अक़्सर
बढ़ जाते हैं अपने पथ पर
बहुत सी बातों से बेख़बर

© अपूर्वा बोरा​

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