अकेले

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अकेले होते हैं हम
जब कदम बढ़ाते हैं
अपनी मंज़िल की ओर
और सामाजिक ढर्रे से दूर

अकेले होते हैं हम
जब आवाज़ उठाते हैं
सही के साथ
और गलत के ख़िलाफ़

अकेले होते हैं हम
जब सामना करते हैं
मुश्किल रास्तों का
और बेसबब वास्तों का

हज़ारों की संख्या
इसी ख़्याल को
वास्तिवकता समझकर
ज़िन्दगी गुज़ार लेती है
ये मानते हुए कि
अकेले हैं हम

ज़रा भ्रम का पर्दा हटा के तो देखो
इसी राह पर चल रहे हैं हम
ज़रा अपनी कहानी सुना के तो देखो
दोस्त, अकेले नहीं हो तुम

 © अपूर्वा बोरा

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