अपरिचित

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बत्ती की
रोशनी से
जगमग
गली से
गुज़रते हुए
शायद ही
उसने सोचा
होगा कि
कोई उसके
जीवन में
कुछ क्षणों
में अंधकार
के बीज बो
सकता है
.
.
आज ऑफिस
से लौटते
हुए वक़्त
की तरह ही
घड़ी की
सुई को
नज़रअंदाज़
कर उसने
अपने आठ
बजे घर
पहुंचने की
डेडलाइन
पार कर
दी थी
.
.
दो घंटे
क्या ही 
होते हैं
गुरुग्राम से
नोएडा जाने
में तो रोज़ाना
इतना वक़्त
लग ही
जाता है
.
.
यही सोचते
सोचते जब
वह ऑटो
से उतरी
तो हिम्मत
जूड़े की
तरह कस
कर आगे
बढ़ चली
.
.
बचपन से
इसी रास्ते
से न जाने
कितनी बार
गुज़र चुकी
थी वो
इसी ख़्याल
में आधा
रास्ता पार
हो गया
था कि
तभी बाइक
के हॉर्न की
आवाज़ से
ध्यान भंग
हुआ और
हड़बड़ा कर
वो रास्ते से
सटी दुकान
के कोने में
दुबक गई
.
.
इतने में
हेडलाइट की
रोशनी से
आँखें चुंधियां
गईं और
उसने हथेली 
से मुख पर
पर्दा डाल दिया
घर से केवल
सौ मीटर की
दूरी थी और
सँकरी गली
में एक वक़्त
पर या तो
इंसान गुज़र
सकता था या
कोई वाहन
.
.
वो निकलने
की प्रतीक्षा
में थी कि
उतनी देर में
दो हाथों ने
उसकी छाती
पर धावा
बोल दिया
और महज़
पांच सेकंड
के वक़्त में
उसके वक्ष
के साथ 
उसके अभिमान
को भी
रौंद कर
रख दिया
.
.
पांच सेकंड
क्या होते हैं
अपने फ़ोन
पर पासवर्ड
डालने जितना
उतने से
वक़्त में
उस रोशन
गली में
अंधियारे के
समंदर में
विलीन हो
चुकी थी वो
.
.
गली में
कुत्तों के
भौंकने का
शोर और
भीतर का
कोलाहल
उफ़ान पर
था और
.
.
बत्ती की 
रोशनी से
जगमग
गली अब
उसकी
आंखों में
चुभने लगी
और इस
परिचित गली
से उस रात
के बाद वो
अपरिचित सी
गुज़रने लगी।

 © अपूर्वा बोरा

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