अपराध

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पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िर यही
किस्सा दोहराया जाता है
रिश्ते नाते समाज की आड़ में
कोई अपराध छिपाया जाता है

हालातों से लड़ना सीखता है कोई
कोई सिसकियों में जीवन बिताता है
इंसाफ के लिए अब अदालत ज़रूरी नहीं
यहाँ फ़ैसला चरित्र देख कर लिया जाता है

आवाज़ उठाता है जो
समाज उसपर उंगली उठाता है
चुपचाप सहता है जो
वो और पीड़ा सहता जाता है

मुख पर उसके शांति है मग़र
भीतर तूफ़ान में हिचकोले खाता है
कभी चीख़ कर ग़ुबार निकालना चाहे
तो चार लोगों के भय से चुप हो जाता है

रास्ते पर लुटती है इज़्ज़त किसी और की
विरोध में हर कोई सड़क पर उतर आता है
अपने घर की इज़्ज़त हो तो बात और है
इसे आत्मसम्मान के साथ दफ़नाया जाता है

इंसानों के जंगल में शोर बहुत है
रुदन कानों तक पहुंच नहीं पाता है
विचरते हैं दानव शराफ़त का लिबास पहने
सरेआम मासूमियत का शिकार किया जाता है

सड़क, बस, चहारदीवारी के भीतर
चुपचाप सब कुछ हो जाता है
अखबार में आती है खबरें रोज़ाना
फ़िर किसी का जीवन उजड़ जाता है

बाँटते हो अपनी कहानी जिससे
वही क़सूरवार तुम्हें ठहराता है
सुनने की ख़ातिर सुनता है वो
पूरा सच जानने से घबराता है

अपने होठों को सी लेता है जो
गम उसका नासूर बन जाता है
किसी और के कर्मों की सज़ा
फ़िर क्यों ख़ुद को दिए जाता है?

आईने में दिखता है जो चेहरा
अब अनजान नज़र आता है
जीना है इसी तरह हाल फिलहाल
ये ख़याल लाचार कर जाता है

पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िर यही
किस्सा दोहराया जाता है
रिश्ते नाते समाज की आड़ में
कोई अपराध छिपाया जाता है

© अपूर्वा बोरा​

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