अरे

अरे, आज़ादी तो दी है तुम्हें
और कितनी चाहिए?

अरे, जब मना कर रहे हैं तुम्हें
तो कुछ सोच समझ कर ही।

अरे, छोटे कपड़े पहनने तो देते हैं तुम्हें
और कितनी छूट चाहिए?

अरे, ऐसे कपड़े पहनकर बाहर जाओगे
तो लोग तो देखेंगे ही।

अरे, सब कुछ तो खाने देते हैं तुम्हें
और कितनी ढील चाहिए?

अरे, मंगलवार/बृहस्पतिवार को मांस खाओगे
तो बुद्धि पर असर होगा ही।

अरे, दोस्ती तो करने देते हैं तुम्हें
और कितने दोस्त चाहिए?

अरे, वे हमसे नीचे दर्जे के लोग हैं
तो दोस्ती रिश्ते में बदलेगी नहीं।

अरे, हमने बड़े खुले माहौल में पाला है तुम्हें
और कितनी ‘कूल’ परवरिश चाहिए?

अरे, यही सीखा है तुमने इतने सालों में
तो हमारी परवरिश का दोष नहीं।

अरे, आज़ादी दी तो है तुम्हें
और कितनी चाहिए?

 

 © अपूर्वा बोरा

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