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उसकी ज़ुल्फ़ सुलझाते सुलझाते मैं ख़ुद उसमें उलझता चला जाता हूँ वो पलट कर देखती है मेरी ओर और मैं उन अदाओं से मचलता चला जाता हूँ

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आओ तोलते हैं अपना ईमान इस तराजू पर सुना है बेईमानों को नये ख़िताब मिल रहे हैं ज़रा झाँककर देखते हैं अपने गिरेबान में भी अपने भी तो बीते कल के दाग़ दिख रहे हैं

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ये काले घेरे शायद मेरी आँखों से गहरे हैं अब तो रातें करवटों के बीच गुज़र जाती हैं सुकून और मेरे बीच न जाने कितने पहरे हैं

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सुनता हूँ जो गीत रातों में मैं धुन सभी उसे भी सुनाना चाहूँ जागा करती है जो तन्हा रातों में उसे अपनी बाहों में सुलाना चाहूँ

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पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िर यही किस्सा दोहराया जाता है रिश्ते नाते समाज की आड़ में कोई अपराध छिपाया जाता है

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ख़ामोश हो गया है वो जो था मुझे सब कुछ बताने वाला बातें याद रखता था जो अब बन गया है उन्हें भुलाने वाला नाराज़ हो गया है वो जो था हरदम मुझे मनाने वाला बाहों में था जो अब बन गया है यादों में समाने वाला

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न जाने कितनी रातें मैं किताबों के संग बिताती हूँ इस आस में कि बाबा की कहानियां ख़ुद दोहरा सकूँ लेटती हूँ जब बिस्तर में तो सताते हैं कल के ख़याल और इस उलझे हुए जाल को मैं सुलझा नहीं पाती मिन्नतें करती हूँ कई बार मग़र वो नज़दीक नहीं बुलाती कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

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चाँद और वो एक दूजे से इतने भी अलग नहीं हर रात चाँद बदलता है आकार भीतर बदलती रहती है वो भी वो सूर्य की ओट में दमकता है खिलती है तेरी रोशनी में वो भी

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फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मग़र ज़िंदगी की डगर मेरे हालातों के कारण थोड़ी ऊबड़खाबड़ है एकाएक मौसम के बिगड़ जाने से मैं जो गिर पड़ा हूँ अब तमाम ज़िंदगी खुद को उठाने में व्यतीत हो जाएगी फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मगर जो हालातों से हार गया तुम कैसे उसे बचा पाती?

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आँखों से जो दिख जाता मिरे दिल का नासूर आप बेवफ़ाई के तमगे से यूँ नवाज़ते नहीं जो खेलते हैं ये दांव ख़ुद को कहकर मजबूर वाहवाही के लिये महफ़िलों को यूँ सुनाते नहीं इंसाफ के कटघरे में खड़ा कर गिनों मिरे क़सूर बेक़सूर अपनी ज़िन्दगी की दास्तां यूँ बताते नहीं

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