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पीढ़ी दर पीढ़ी फ़िर यही किस्सा दोहराया जाता है रिश्ते नाते समाज की आड़ में कोई अपराध छिपाया जाता है

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ख़ामोश हो गया है वो जो था मुझे सब कुछ बताने वाला बातें याद रखता था जो अब बन गया है उन्हें भुलाने वाला नाराज़ हो गया है वो जो था हरदम मुझे मनाने वाला बाहों में था जो अब बन गया है यादों में समाने वाला

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न जाने कितनी रातें मैं किताबों के संग बिताती हूँ इस आस में कि बाबा की कहानियां ख़ुद दोहरा सकूँ लेटती हूँ जब बिस्तर में तो सताते हैं कल के ख़याल और इस उलझे हुए जाल को मैं सुलझा नहीं पाती मिन्नतें करती हूँ कई बार मग़र वो नज़दीक नहीं बुलाती कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

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चाँद और वो एक दूजे से इतने भी अलग नहीं हर रात चाँद बदलता है आकार भीतर बदलती रहती है वो भी वो सूर्य की ओट में दमकता है खिलती है तेरी रोशनी में वो भी

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फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मग़र ज़िंदगी की डगर मेरे हालातों के कारण थोड़ी ऊबड़खाबड़ है एकाएक मौसम के बिगड़ जाने से मैं जो गिर पड़ा हूँ अब तमाम ज़िंदगी खुद को उठाने में व्यतीत हो जाएगी फिसला होता तो तुम हाथ दे शायद मुझे संभाल पाती मगर जो हालातों से हार गया तुम कैसे उसे बचा पाती?

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आँखों से जो दिख जाता मिरे दिल का नासूर आप बेवफ़ाई के तमगे से यूँ नवाज़ते नहीं जो खेलते हैं ये दांव ख़ुद को कहकर मजबूर वाहवाही के लिये महफ़िलों को यूँ सुनाते नहीं इंसाफ के कटघरे में खड़ा कर गिनों मिरे क़सूर बेक़सूर अपनी ज़िन्दगी की दास्तां यूँ बताते नहीं

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रात के अंधेरे में निकली जगमग जुगनुओं की बारात क़सूर था बादलों का जिसने ढाँप लिया पूरा आसमान और हमने बेवज़ह ही चाँद के फ़र्ज़ पर लगा दिया इल्ज़ाम

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मैं अकेली नहीं हूँ ये आवाज़ें हैं ना रात के सन्नाटे में धीरे से कान में फुसलाकर मुझे नाम लेकर पुकारा करती हैं

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सुना है वो ज़माने से हमारी शिकायतें करता फिरता है एक हम हैं जो उसके लबों से अपना ज़िक्र सुन मचल जाते हैं वो गैरों की महफ़िलों में गुज़ारता है आजकल शाम एक हम हैं जो उसके आने की उम्मीद से बहल जाते हैं

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तुम होते तो अलग बात होती सवेरे की अदरक वाली चाय पर हमारी गुफ़्तगू कमाल होती मैं अपनी कविताएं पढ़ती तो तुम्हारी कहानियां भी साथ होती तुम होते तो अलग बात होती

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