गहरी नींद में होने के बाद भी कम्बल रजाई की सौ परतों के बाद भी किसी तरह तुम्हारे हाथ मेरी कमर तक का सफ़र तय कर ही लेते हैं

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बहुत कविताएं मैंने अपनी दोस्ती की तरह अधूरी छोड़ दी नहीं कोई शिकवा नहीं कोई रंजिश नहीं मगर कहने को कुछ बाकी भी तो नहीं

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मैंने कई बार कोशिश की कि चंद शब्दों में अपना हाल ए दिल बयां कर सकूँ मग़र ये हो न सका और ये खामोशी अब सही नहीं जाती

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Ownership By Apoorva Bora You came to my place disguised as an eligible groom,Looking for prey, not a bride.Your eyes settled on the ladywho just entered the room,Beauty walking with…

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खाने में क्या है? दाल चावल। भौहैं तन जाती थीं और सर्र से ज़ुबान से तीर निकलता था आज भी?

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सवाल पूछना तो ज़ुर्म नहीं है फ़िर जवाब में आवाज़ें क्यों दबाते हो?

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बसंत ऋतु a.k.a Spring बादामी लहंगे में सजी धरा ने पीली चुनरी सिर पर सजा ली और ओढ़ लिया नीला आसमान बगिया में खिलने लगी कलियां और उन्हें देर तलक तकने लगे सूरज मियां

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घर से फ़ोन आता था मैं आफिस में व्यस्त रहती थी दस मिनट की देरी में करीबन पचास मिसकॉल व उतने ही मैसेज आने से मेरे मोबाइल की स्क्रीन जगमगा उठती थी

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पतझड़ का मौसम आते ही जैसे एक पत्ता अपनी डाली से वियुक्त होने के लिए आतुर हो उठता है

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ख़्वाब के बीज तो बो दिए हैं उन बीजों के कोपल निकलने से लेकर उनके वृक्ष बनने तक उस ख़्वाब की रखवाली कैसे करूँ?

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