बाकी है

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शब्द तो कोरे हैं
अभी उन्हें जज़्बातों में
डुबोना बाकी है
किस्से तो थोड़े हैं
अभी उन्हें कहानी में
पिरोना बाकी है

रिश्ते तो कोरे हैं
अभी उन में वात्सल्य
उमड़ना बाकी है
लम्हें तो थोड़े हैं
अभी उन में ज़िन्दगी
भरना बाकी है

मकान तो कोरे हैं
अभी उनका घर
बनना बाकी है
रास्ते तो थोड़े हैं
अभी उनका मंजिल
पहुंचना बाकी है

शायर तो कोरे हैं
अभी उन्हें दिल
खोना बाकी है
आशिक तो थोड़े हैं
अभी उन्हें मोहब्बत
होना बाकी है

शब्द तो कोरे हैं
अभी उन्हें जज़्बातों में
डुबोना बाकी है
किस्से तो थोड़े हैं
अभी उन्हें कहानी में
पिरोना बाकी है।

 © अपूर्वा बोरा

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