बात

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एक रात की बात नहीं
कितनी नींदों की कुर्बानी थी
अंधेरे के बाद एक सहर हो नई
आरज़ू ये बहुत पुरानी थी

एक जीत की बात नहीं
हारी बाजियों की निशानी थी
साँसों के जतन लगे थे कई
बुझती लौ फ़िर से जलानी थी

एक ज़िन्दगी की बात नहीं
जो किसी की कैद में बितानी थी
बेबसी के उस आलम में भी
उम्मीद कोई जगानी थी

एक लम्हें की बात नहीं
उनसे कुछ यादें चुरानी थी
आँसूओं के समंदर में कभी
मुस्कुराहट की नैया चलानी थी

एक साथ की बात नहीं
यारी ख़ुद से ही निभानी थी
फ़ासला था जब अपनों से सभी
हिम्मत खुद ही जुटानी थी

एक मंज़िल की बात नहीं
अपनी राह ख़ुद बनानी थी
उलझनों के दरमियां ही सही
मुश्किलें ख़ुद ही सुलझानी थी

एक जंग की बात नहीं
ये ताउम्र बग़ावत की कहानी थी
बातें जो किसी से न कही
एक कोरे कागज़ को सुनानी थी

© अपूर्वा बोरा​

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