बाबा

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खुले आंगन में झूला झली थी
हरी घास के मैदान में चली थी
बाबा तुम्हारी बगिया की
मैं सबसे नन्हीं कली थी

छोटे से मकान में भरा पूरा घर था
रिश्ते नातों में भी न कोई डर था
बाबा तुम्हारे लालन पालन का
मुझ पर कुछ ऐसा ही असर था

ऊँची आवाज़ की ज़रूरत नहीं थी
ख़ुद रो लेने की इज़ाज़त यहीं थी
बाबा तुम्हारी गोद में पली
मैं नाज़ुक ही सही थी

सूरज की पहली किरण संग जागना था
ओस पड़ी घास पर नंगे पैर भागना था
बाबा तुम्हारे पास सुकून की नींद का
मुझे एक और मौका मांगना था

हर शाम क़िस्सागोई सुनती थी
ख़यालों में उन्मुक्त उड़ती थी
बाबा तुम्हारी विचारधारा से फ़िर
मैं निराली कहानियां बुनती थी

मंज़िल का रास्ता भले ही बेगाना था
सपनों की ख़ातिर आगे बढ़ते जाना था
बाबा तुम्हारे साथ जितना मिले कम है
मुझे अभी और वक़्त बिताना था

दूर शहर में अकेले रह लेती हूँ
घर में कैद आजकल सह लेती हूँ
बाबा तुम्हारी फिक्र होती है तो मैं
ये बातें छिपा *ठीक हूँ* कह लेती हूँ

© अपूर्वा बोरा​

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