बचपन वाली नींद

Photo by Ivone De Melo from Pexels

न जाने कितनी रातें मैं किताबों के संग बिताती हूँ
इस आस में कि बाबा की कहानियां ख़ुद दोहरा सकूँ
लेटती हूँ जब बिस्तर में तो सताते हैं कल के ख़याल
और इस उलझे हुए जाल को मैं सुलझा नहीं पाती

मिन्नतें करती हूँ कई बार मग़र वो नज़दीक नहीं बुलाती
कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

न जाने कितनी रातें अपने हाथों का तकिया बनाती हूँ
इस आस में कि बुआ की तरह ख़ुद को थपका सकूँ
लेटती हूँ जब बिस्तर में तो बदलती करवटों की मजाल
कि मैं इस अनंत कुचक्र से बाहर निकल नहीं पाती

आज़माती हूँ कई बार मग़र वो सुकून नहीं दिलाती
कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

न जाने कितनी रातें ग़ज़लों की सेज बिछाती हूँ
इस आस में कि माँ की लोरियां ख़ुद को सुना सकूँ
लेटती हूँ जब बिस्तर में तो तन्हा रहता है मेरा हाल
और इस एकाकीपन के एहसास से उबर नहीं पाती

कोशिशें करती हूँ कई बार मग़र वो लाड़ नहीं जताती
कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

न जाने कितनी रातें जज़्बातों को शब्दों में सजाती हूँ
इस आस में कि सपने सिरहाने पर रख कर सो सकूँ
लेटती हूँ जब बिस्तर में तो ख़्वाबों से होते हैं ये सवाल
कि इस परेशानी का कोई हल बूझ क्यों नहीं पाती

पुकारती हूँ कई बार मग़र वो इस राह नहीं आती
कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

न जाने कितनी रातें इंतज़ार में गुज़ारती हूँ
इस आस में कि कभी दोबारा बेफ़िक्र मैं सो सकूँ
लेटती हूँ जब बिस्तर में तो फ़िर आता है ये ख़याल
कि कम्बख़्त, अब वो बचपन वाली नींद नहीं आती

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply