बड़ी दुविधा है

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बड़ी दुविधा है
महीना अभी
आधा भी नहीं
कटा है और
राशन लेने से
लेकर बाई
के पैसे देने
तक खुद के
लिए शायद
ही कुछ
खरीदने का
वक़्त मिले

बड़ी दुविधा है
सफ़ाई वाली
दीदी कुछ दिन
छुट्टी पर क्या गईं
घर में तो कोहराम
मच गया दो दिन
पहले ही घर में
कॉकरोच दिखा
था शायद एक
स्प्रे भी लेना पड़े

बड़ी दुविधा है
इस चिपचिपी
गर्मी में फल
कौनसे चुनने हैं
आधों में रस
नहीं तो बाकी में
मिठास की कमी
है शायद इस
बार भी घर से
ही कुछ सामान
मंगवाना पड़े

बड़ी दुविधा है
पैसे ख़र्चते ख़र्चते
हम खुद ही खर्च
हो रहे हैं और
महंगाई तो पता
नहीं कौनसा
आसमान नापने
लगी है जिसमें
अपनी आमदनी
आजकल अपनी
भी ना लगे

बड़ी दुविधा है
अभी शनिवार आते
आते दोस्तों का भी
जलसा सा लग
जाएगा और बचे हुए
पैसे और रातें उसी
में निपट जाएंगी
सोमवार कब दस्तक
दे इसका होश भी
जब ना रहे 

तो समझ लेना बन्धु
बड़ी दुविधा है।

 © अपूर्वा बोरा

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