बीमार का हाल

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बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?
साँसों का मिज़ाज़ ठीक है
और हरारत से घबराते नहीं हम
आग बुझ गयी है भीतर
और अब चिंगारी भी नहीं जलाते हम

बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?
धड़कनों की लय ठीक है
और बेचैनी को गिनते नहीं हम
तूफ़ान थम गया है भीतर
और अब हवा भी नहीं देते हम

बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?
शरीर के हालात ठीक हैं
और चित्त को शांत करते नहीं हम
इच्छाशक्ति घुट गई है भीतर
और अब उम्मीद भी नहीं जगाते हम

बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?
दुनिया के रंग तो ठीक हैं
और दुनियादारी से झिझकते नहीं हम
खुशियां खो गईं है भीतर
और अब ढूँढ भी नहीं पाते हम

बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?
जीवन के आसार तो ठीक हैं
और मौत से नहीं घबराते हम
जीने की चाह नहीं है भीतर
और अब जीना भी नहीं चाहते हम

बीमार से पूछते हैं हाल कैसा है?

© अपूर्वा बोरा​

This Post Has 3 Comments

  1. Brianten

    Maintain the helpful work and generating the crowd!

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