बोझ

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इतनी देर हुई
ख़यालों में गुम हम
घर से निकले थे
ज़माने से गम के
एवज़ में खुशियों
का सौदा करने
सूरज ढल गया
और चाँदनी रात
में गली से बाहर
निकल कर देखा
तो हर दूसरे की
झोली में गम का
पलड़ा भारी था
और पल भर की
खुशी का दाम
हमारी ज़िंदगी से
भी महँगा था
दोस्ती का वास्ता दे
और मोहब्बत की
बाँहें थाम हम भी
चल पड़े इस उम्मीद
में कि अपना कुछ
तो गुज़ारा होगा
बगल में खड़े साथी
भी मोड़ की ही भांति
आते रहे जाते रहे
थक हार कर लौट
पड़े जब घर की ओर
तो आंगन में पैर
रखते ही अम्मा ने
हमारा नाम पुकारा
बाबा ने दरवाज़ा खोला
और बुआ ने चाय परोसी
सच कहती हूँ
अब तुमसे भी क्या छिपाना
वो गम का जो बोझ था
कुछ हल्का हो गया।

© अपूर्वा बोरा​

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