बोझ

Photo by Akhila Katuri on Unsplash

इतनी देर हुई
ख़यालों में गुम हम
घर से निकले थे
ज़माने से गम के
एवज़ में खुशियों
का सौदा करने
सूरज ढल गया
और चाँदनी रात
में गली से बाहर
निकल कर देखा
तो हर दूसरे की
झोली में गम का
पलड़ा भारी था
और पल भर की
खुशी का दाम
हमारी ज़िंदगी से
भी महँगा था
दोस्ती का वास्ता दे
और मोहब्बत की
बाँहें थाम हम भी
चल पड़े इस उम्मीद
में कि अपना कुछ
तो गुज़ारा होगा
बगल में खड़े साथी
भी मोड़ की ही भांति
आते रहे जाते रहे
थक हार कर लौट
पड़े जब घर की ओर
तो आंगन में पैर
रखते ही अम्मा ने
हमारा नाम पुकारा
बाबा ने दरवाज़ा खोला
और बुआ ने चाय परोसी
सच कहती हूँ
अब तुमसे भी क्या छिपाना
वो गम का जो बोझ था
कुछ हल्का हो गया।

 © अपूर्वा बोरा

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