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तू तो किनारे के उस पार खड़ा था मैं आवाज़ लगाता भी तो कैसे शोर लहरों का था या अंतर्मन का हाल बेहाल था ये बताता भी तो कैसे

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कहानी में जोड़ तलाश रही हो क्यों कविता में ताल ढूंढ रही हो ज्वालामुखी हो तुम ख़ुद क्यों औरों में मशाल ढूंढ रही हो

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मैं उसे बरसों से जानती थी कंधे पर कल का बोझ इतना था कि कमर दुहरी हो चली थी आँखों के नीचे स्याह घेरे थे क्योंकि धुआँ ग़म तो भुला देता है मग़र उसकी सूरत भुला नहीं पाता

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अब के जो मिलो तो सागर पार मिलना मिलना फ़िर से बिछड़ने के लिए ही सही सही और गलत के मैदान के पार मिलना

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दिन ढलने पर लेट तो जाते हैं मग़र रात सिरहाने नहीं आती तुम्हारी ख़ातिर आँखें मूँद रहे हैं मग़र तुम्हारे बग़ैर इन आँखों में नींद नहीं आती

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बार बार लौट कर आती क्यों है ये उदासी की बदली छाती क्यों है तेरी बाहों में सिमट कर नींद आ भी जाये मग़र तेरी ग़ैरमौज़ूदगी में जगाती क्यों है ये उदासी की बदली छाती क्यों है

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यूँ न झटको अपने गेसुओं का सौंधापन देखा है पत्तों को कभी ओस झटकते हुए? कुछ दृश्य सीधे ह्रदय में उतर जाते हैं और तुम्हारे गेसुओं में हम भी भीग जाते हैं

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सिसकियों की गूँज है सिरहाने मेरे लफ़्ज़ों में सिमटते नहीं हैं फ़साने मेरे

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बिखरे बिखरे से रहते हैं मेरे ख़याल हालात के धागे में पिरो कर बुनने किसी रोज़ आओ ये कहानी सुनने

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तुम्हारा मेरी ओर देखना और मेरा हाथ थामने से पहले अपना हाथ आगे बढ़ाना ऐसा नहीं कि इन्हें किसी और ने थामा ही न हो मग़र जहां प्यार नहीं अधिकार जताया गया हो उनके लिये तुम्हारा यूँ सकुचा कर हाथ बढ़ाना ये तो पहली बार है

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