चाँद और वो

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चाँद और वो
एक दूजे से
इतने भी अलग नहीं
हर रात चाँद बदलता है आकार
भीतर बदलती रहती है वो भी
वो सूर्य की ओट में दमकता है
खिलती है तेरी रोशनी में वो भी

चाँद और वो
एक दूजे से
इतने भी अलग नहीं
नये से वर्धमान से अर्ध से पूरा
साथ सफ़र करती है वो भी
२८ दिन लगते हैं चाँद को
लगते है २४ घँटे उसे भी

चाँद और वो
एक दूजे से
इतने भी अलग नहीं
गायब रहता है चाँद एक रात
छिपती है कुछ रातों में वो भी
चाँद अमावस में तन्हा रहता है
डूबती है तन्हाई में वो भी

चाँद और वो
एक दूजे से
इतने भी अलग नहीं
चाँद सामने होकर भी पहुँच से दूर है
रखती है फ़ासला दुनिया से वो भी

चाँद कल हमें आसमान में न दिखा
क्योंकि खड़ी थी बालकनी में वो भी

चाँद और वो
एक दूजे से
इतने भी अलग नहीं

© अपूर्वा बोरा​

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