चाहकर भी

दिन तो बीत जाता है मग़र रातें काटी नहीं जाती
लबों को सी लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये बातें किसी से बाँटी नहीं जाती

हौसला तो रह जाता है मग़र कोई आस नहीं आती
तन्हा जी लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये हक़ीक़त रास नहीं आती

वो तो चला जाता है मग़र यादें कहीं नहीं जाती
अश्कों को पी लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये ह्रदय की पीड़ा सही नहीं जाती

हादसा तो घट जाता है मग़र कोई ख़बर नहीं आती
राज़ को छिपा लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये अंधेरे के बाद सहर नहीं आती

धागा तो जुड़ जाता है मग़र गाँठ सुलझाई नहीं जाती
उलझनों को समझ लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये रहीम की नसीहत भुलाई नहीं जाती

इंसान टूट जाता है मग़र कोई आवाज़ नहीं आती
ख़ुद को संभाल लेने की अब आदत हो गई है हमें
और चाहकर भी ये आदतों से बाज़ नहीं आती

दिन तो बीत जाता है मग़र रातें काटी नहीं जाती
लबों को सी लेने की अब आदत हो गई है हमें
चाहकर भी ये बातें किसी से बाँटी नहीं जाती

© अपूर्वा बोरा​

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