चाय

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सूरज ने
विदा ली
और 
सांझ ने
हौले से
दस्तक दी
इतने में
बुआ ने
चूल्हे से
केतली उतार
गरम चाय
की प्याली
आंगन में रख दी
उस प्याली
का साथ देने
मेरे बाबा
और मेरी अम्मा
अंगीठी को
धुरी बना
घेरे में
आग सेंकने
बैठ गए
और
उनका साथ देने
गौरैया का
जोड़ा भी
आम के पेड़
पर बने
अपने घोंसले में
बैठ गया
जहाँ नीचे 
चाय की
चुस्कियां सुनाई देती
वहाँ ऊपर
जोड़े की
चहचहाट सुनाई पड़ती
मेरे आने की
आहट को
इन दोनों जोड़ो के
वार्तालाप ने
ढाँप लिया
और
मैं भी
दबे पांव
आंगन को
पार करने लगी
मग़र
मग़र देखती हूँ
कि उसी
चुबूतरे पर
एक और प्याली
रखी है
जिसका साथ 
देने के लिए
रखे हैं मैरी गोल्ड
के चार बिस्किट
नज़रों के छोर 
से देखती हूँ
तो रसोई से
झांकती बुआ
की आंखों से
टकराती हूँ
और
सुन लेती हूँ
वो मधुर शब्द
जो सुनने के 
लिए परदेस
में कान तरस
जाते हैं
चाय के साथ पकौड़े खाओगी?
और 
जवाब में
एक और सवाल 
पूछ लेती हूँ
चटनी भी मिलेगी क्या?
.
.
और बस
यूँ ही
कैद कर लेती हूँ
इन नाज़ुक
क्षणों को
अपनी यादों में
.
.
और फिर
किसी दिन
जब सूरज
विदा लेता है
और सांझ 
हौले से
दस्तक देती है
मग़र मैं
परदेस में होती हूँ
तो यही
सोचती हूँ
कि कैसे
बुआ ने 
आज फिर
चूल्हे पर
केतली चढ़ाई होगी
और परोसते वक़्त
एक प्याली ज़्यादा
लगा दी होगी
जिसे बाबा 
और अम्मा
मिल कर 
निपटा लेंगे
शायद
या
किसी पड़ोसी 
को रोक लेंगे
एक कप
चाय के लिए
शायद
कौन जाने
.
.
जानती तो
केवल इतना हूँ
कि इस
परदेस में
जब घर लौटूंगी
तो कोई
एक एक्स्ट्रा 
चाय की प्याली
नहीं बनाएगा
और न ही कोई
मैरी गोल्ड
के बिस्किट रखेगा
और न ही कोई
चाय के साथ
पकौड़ियों का
लालच देगा
साथ मिलेगा
तो शायद
मेरे ही जैसे
किसी का
जो पहाड़ों से
तो दूर हो गया
मग़र पहाड़ 
उससे नहीं।

 © अपूर्वा बोरा

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