चंद पंक्तियां​

Photo by Lucrezia Carnelos on Unsplash

आओ तोलते हैं अपना ईमान इस तराजू पर
सुना है बेईमानों को नये ख़िताब मिल रहे हैं
ज़रा झाँककर देखते हैं अपने गिरेबान में भी
अपने भी तो बीते कल के दाग़ दिख रहे हैं

फल फूल से ढके हैं भगवान सिर से पैर तक
और यहाँ भक्त खाली पेट ही सो रहे हैं
दूसरों की निष्ठा पर सवाल क्यों उठाया जाए
जब उनके दामन उम्मीद से भर रहे हैं

इश्क़ की बातें अब बस किताबों में जँचती हैं
सुना है आशिक़ ख़ूबसूरती देख बहक रहे हैं
जनमों के कसमें वादे एक संग कौन निभाये
यहाँ विकल्प देख सब के चेहरे दमक रहे हैं

इज़्ज़त भी मिलती है शौहरत भी मिलती है
मग़र दो वक़्त की रोटी के लाले पड़ रहे हैं
कहानी के सौदागरों से पूछो बाज़ार का हाल
कलाकार भी अब कौड़ियों के भाव बिक रहे हैं

इंसानियत तो दुर्लभ ही है हाल फिलहाल
तभी शायद इंसानों के खरीददार बढ़ रहे हैं
ज़िन्दगी आसान किस की है मेरे यार
हम सब ये जंग अकेले ही तो लड़ रहे हैं

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply