दानव

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बचपन में
अपने ही
कमरे में
सोने से 
पहले
बाबा को
अपने ही
पलंग के
तले का
मुआयना
करने के
लिए कहती
थी जो
पांच वर्ष
की बालिका
.
.
आज
किशोरावस्था की
दहलीज पर
कदम रख
चुकी है
और 
समझ चुकी है
कि जिन
दानवों की
अपनी कल्पना से
रात के 
अंधेरों में जीवन दिया 
करती थी
वो मिथ्या थे
.
.
वास्तविक 
दानव तो
शिकारी की
भांति
उसके 
आस पास
ही जाल
बिछा रहे हैं
कोई मुंहबोले 
रिश्तों में तो कोई
खून के रिश्तों
की गहराइयों में
तृष्णा के 
गोते लगा रहे हैं
.
.
वास्तविक
दानव तो
गिद्ध की
भांति
उसके
चारों ओर
मंडरा रहे हैं
कोई दोस्ती
की आड़ में
तो कोई
पहली ही
मुलाकात में
मर्यादाओं का
मख़ौल उड़ा रहे हैं
.
.
वास्तविक
दानव तो
सभ्यता
सुशीलता
और
संयमता
के नक़ाब
के पीछे
अपना चेहरा
छिपा रहे हैं
.
.
और 
आज जब
वह किशोरी
अपने
बाल्यकाल
का स्मरण 
करती है
तो यही 
सोचती है
कि
क्यों
.
.
आखिर क्यों
उसे कहानी
सुनाई गई
कल्पना के
दानवों की
और 
छिपा दिया
उससे
सामाजिक दानवों
का सत्य
.
.
आखिर क्यों
उसे कहानी
सुनाई गई
एक लज्जा
के घूँघट की
और छिपा दिया
उससे
कांपती चीखों
का सत्य
.
.
आखिर क्यों
उसे कहानी
सुनाई गई
एक बलशाली
राजकुमार की
और 
छिपा दिया 
उससे
नारी शक्ति
का सत्य
.
.
आखिर क्यों
छिपा दिया
उससे 
समाज का सत्य
.
.
बचपन में
अपने ही
कमरे में
सोने से 
पहले
बाबा को
अपने ही
पलंग के
तले का
मुआयना
करने के
लिए कहती
थी जो
पांच वर्ष
की बालिका
.
.
आज
अपने ही
घर से
बाहर 
निकलने से 
पहले
अपने ही
घर के
किवाड़ों,
झरोखों,
लोगों
और
रिश्तों
का
मुआयना
करती है
वो
बीस वर्ष
की किशोरी।

 © अपूर्वा बोरा

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