देख न माँ

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी डाँट से डर लगता था
अब उसकी चुप्पी से घबरा जाती हूँ
देख न माँ तुझसे दूर रहकर भी
मैं तुझे ख़यालों में करीब पाती हूँ

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी चिंता बोझिल लगती थी
अब उसकी फ़िक्र में डूब जाती हूँ
देख न माँ तुझसे हाल पूछ कर भी
मैं बाबा से सच्चाई दोहराती हूँ

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी टोकाटाकी सताती थी
अब उसकी ग़ैरमौज़ूदगी पाती हूँ
देख न माँ तेरे ना कहने पर भी
मैं उन सभी आदतों को सुधारती हूँ

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी फ़ोन से दुश्मनी लगती थी
अब उसकी वीडियो कॉल उठाती हूँ
देख न माँ हमारे बीच का फ़ासला भी
मैं चुटकियों में ऐसे ही मिटाती हूँ

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी गोद में नींद सुकून लगती थी
अब उसकी याद में रात गुज़ारती हूँ
देख न माँ तेरे होने का एहसास भी
मैं ख़ुद को थपकी दे कराती हूँ

अगली दफ़ा जब डाँटोगी न
पक्का मुँह नहीं फुलाऊंगी
अगली दफ़ा जब चिंता करोगी न
पक्का कारण समझ जाऊँगी
अगली दफ़ा जब टोकोगी न
पक्का बात मान जाऊँगी
अगली दफ़ा जब कॉल करोगी न
पक्का पहली रिंग में उठाऊँगी
अगली दफ़ा जब सुलाओगी न
पक्का हमेशा की तरह सो जाऊँगी

सुनो माँ अगली दफ़ा जब मिलोगी
बस मुझे अपनी गोद में जगह दे देना
मेरे बालों में हाथ फहराते हुए बस
मेरी आँखों को पुचकारते रहना
जब नींद के आगोश में समाने लगूँ
तो बस प्यार से थपकाते रहना

वक़्त कितना जल्दी बीत गया
जिसकी अनुभूति कल की बात लगती थी
अब उसकी ही कल्पना में खो जाती हूँ
देख न माँ तुझे जो सामने जता नहीं पाती
मैं वो प्यार कविताओं में जताती हूँ
तेरे लिए शायद शब्द इंसाफ न कर सकें
मग़र मैं कोशिश करती जाती हूँ

© अपूर्वा बोरा​

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