गाना

जीना यहाँ
मरना यहाँ
इसके सिवा
जाना कहाँ
.
.
सारेगामा
कारवां पर
मुकेश के
गाने चला
और खुले
बालों को
जूड़े की
पिन से 
बांधते हुए
जैसे किसी
नटखट बालक
को उसकी
माँ अपनी
नज़रों से
बांध लेती है
ठीक वैसे ही
.
.
इतने में
कुछ घुंघराली
लटें मुख पर
पर्दा डाल गयीं
और उसे
कानों के
पीछे रखने की
एक और
नाक़ाम
कोशिश कर
उसने
सिरहाने लगी
तकिया से
अपनी दुखती
पीठ को
सहारा दिया
और एक
गहरी
सांस ली
.
.
गाना अब 
बदल गया था
ज़माने की
ही तरह
और
साथ ही
गुनगुनाने लगी
थी वो
उस ज़ुल्फ़ को
अपनी उंगलियों
में लपेटते हुए
.
.
कहीं दूर जब 
दिन ढल जाए
साँझ की दुल्हन 
बदन चुराए
चुपके से आए

मेरे खयालों के 
आँगन में
कोई सपनों के
दीप जलाए
.
.
और 
बस अपने
कमरे की
बत्ती बुझा
शून्य आंखों से
अपनी दसवीं
मंज़िल की
खिड़की से
बाहर देखती है
तो पाती है
.
.
रौनक
हज़ारों दीप
जगमगाते हुए
कांच की
इन ऊंची
इमारतों पर
और 
तारों की
धुंधली सी
झिलमिल को
और बस 
उसी शून्यता को
अपनी आंखों से
उतार
जैसे आफिस से
लौटकर
ऐनक उतारा
करती है
ठीक वैसे ही
.
.
उसने अपने
बालों को
कैद से 
आज़ाद किया
और
एक नई
उमंग को
आगोश में
भर लिया
.
.
खिड़की पर
पर्दा गिराते हुए
वो वापिस 
अपने बिस्तर पर
जा बैठ गयी
.
.
गाना फ़िर 
एक बार 
बदल गया था
और साथ ही
बदल गई थी
उसकी मनःस्थिति
.
.
एक और
नई धुन
गुनगुना उठी
केवल
इस बार
आवाज़ तो
मुकेश की थी
मग़र शब्द
शायद
उस के 
ही दिल से
निकले थे
.
.
कुछ पाकर 
खोना है
कुछ खोकर 
पाना है
जीवन का 
मतलब तो
आना और 
जाना है

दो पल के 
जीवन से
इक उम्र 
चुरानी है

ज़िंदगी और 
कुछ भी नहीं
तेरी मेरी 
कहानी है

 © अपूर्वा बोरा

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