गर ऐसा हो

गर ऐसा हो
कि बेचैन
सी एक 
रात हो
और मैं
उत्कंठा के
समंदर में
डूबने लगूँ
तो क्या
किनारा दिखा
पाओगे?

गर ऐसा हो
कि खामोश
सी एक
रात हो
और मैं
दुःस्वप्न के
अनन्त पाश में
सिमटने लगूँ
तो क्या
निज़ात दिला
पाओगे?

गर ऐसा हो
कि गुमसुम
सी एक 
रात हो
और मैं
तन्हाई के
कुचक्र में
उलझने लगूँ
तो क्या
हल बूझा
पाओगे?

गर ऐसा हो
कि अंधेरी
सी एक
रात हो
और मैं
साहस का
हाथ थाम
न सकूँ
तो क्या
मशाल जला
पाओगे?

गर ऐसा हो
कि मैं
तुम्हें ये सब
समझा न सकूँ
तो क्या
समझ पाओगे?

© अपूर्वा बोरा​

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