घर

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दिल में जगह दी थी जिसे
उसने बिन दस्तक बिन आवाज़
कल रात घर ख़ाली कर दिया
उसके दिए हुए उम्मीद के फ़ूल
अभी भी मेज़ पर सजे हुए हैं
ऐसी किस हड़बड़ी में वो था जो
इस गुलदस्ते को यहीं छोड़ गया
शायद नए फूल खरीदने निकला था
और मुझे इत्तिला करना भूल गया
शायद बाहर टहलने निकला था
और घर का रास्ता भूल गया
शायद? शायद।

दिल में जगह दी थी जिसे
उसने बिन दस्तक बिन आवाज़
कल रात घर ख़ाली कर दिया
संग गुज़ारे थे जो हसीं पल कभी
दीवारों पर टँगी हैं यादें वो अब भी
ऐसी किस हड़बड़ी में वो था जो
इन अविकसित फ़िल्मों को छोड़ गया
शायद नई तस्वीर उतारने निकला था
और मुझे इत्तिला करना भूल गया
शायद बाहर टहलने निकला था
और घर का रास्ता भूल गया
शायद? शायद।

दिल में जगह दी थी जिसे
उसने बिन दस्तक बिन आवाज़
कल रात घर ख़ाली कर दिया
उसके जिस्म की महक से इस
कमरे का हर कोना भरा हुआ है
ऐसी किस हड़बड़ी में वो था जो
अपना इतर यहीं पीछे छोड़ गया
शायद कुछ नया आज़माने निकला था
और मुझे इत्तिला करना भूल गया
शायद बाहर टहलने निकला था
और घर का रास्ता भूल गया
शायद? शायद।

दिल में जगह दी थी जिसे
उसने बिन दस्तक बिन आवाज़
कल रात घर ख़ाली कर दिया
कुछ सामान छोड़ कर गया है
तो कभी तो लौटकर आएगा
मेरी ज़िंदगी में रहे न रहे मग़र
इस घर पर हक़ ज़रूर जताएगा
ऐसी कौन से हालात थे जो
मुझे इत्तिला करना भूल गया
शायद कहीं और आसरा मिला
और वो घर का सुख भूल गया
शायद बाहर टहलने निकला था
और घर का रास्ता भूल गया
शायद? शायद।

अब वो आये न आये
यादों का तो सहारा हो जाएगा
और इस शायद के किराए से
घर का गुज़ारा भी हो जाएगा

© अपूर्वा बोरा​

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