गुमनामी

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एक गुमनामी की ज़िन्दगी
चुन लेते हैं हम अपने लिए
जब किसी गैर को अपना
उसकी ज़िन्दगी सँवारने में
गुज़ार देते हैं अपनी ज़िन्दगी
नहीं मैं ये नहीं कह रही कि
ऐसा करना गुनाह है कोई
क्योंकि यही तो देखते आये
हैं हम अपने घरों में बचपन
से ही कि एक की खुशी के
लिये दूसरा अपने मन की
बात मन में ही रख लेता है
और दूसरे की खुशी के लिए
पहला कुछ भी बोल देता है
शायद एक दूसरे का साथ
उनके लिए काफी होता है
और ये ख़याल कि प्यार कहीं
फीका पड़ रहा है उन्हीं कोनों
में दुबक जाता है जहाँ हर दिन
की एक दूसरे से जुड़ी थोड़ी
कड़वी बातें छिपाई जाती हैं
मगर रात के अंधेरों में जब
तन्हाई घर करने लगती है
तब याद आते हैं वो सभी पल
जिन में जिंदा होने का एहसास
किया था आखिरी बार जिन में
दिल से हँसे थे आखिरी बार
साथ हैं मगर अकेलापन फ़िर
भी कहीं बाकी है एक होश में
बेहोशी का आलम कहीं बाकी है
अपनों के बीच यूँ बेगाना सा एक
फसाना कहीं बाकी है सब पूरा है
मगर कुछ अधूरा कहीं बाकी है
और इस अधूरेपन को भरने की
कोशिश करते करते उसी गुमनामी
की ज़िन्दगी में और उलझते चले
जाते हैं कि शायद सब बदल जाए
और इसी तरह उसकी खुशियों का
बोझ अपने कंधे उठाये फिरते हैं कि
शायद कल उसे तुम्हारी फीकी
मुस्कान कम लगे और बिछा दे वो
भी खुद को तुम्हारे लिए हँसी ढूँढ
लाने में और इसी तरह बिना किसी
के कहे बस एक शायद के सहारे
इसी ज़िन्दगी में गुम हो जातें हैं हम
और कल की खुशी के भरोसे आज
का गम छिपा लेते हैं वहीं दिल के
किसी कोने में और गुज़ार लेते हैं
पूरी ज़िन्दगी यूँ ही गुमनामी में।

© अपूर्वा बोरा​

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