हक़

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शरीर उसका है
तो उस पर हक़ भी उसका ही होगा

कपड़ों का विस्तार कम हो या ज़्यादा
पहनने या न पहनने का फैसला भी उसका ही होगा

होठों पर लाली हो या आँखों में काजल,
श्रृंगार या सादगी का अधिकार भी उसका ही होगा

शर्म हया की नजरें या तमतमाता ललाट
भावों की अभिव्यक्ति का तरीका भी उसका ही होगा

अकेले हो या किसी के सहारे हो
मैदान में खड़े रहने का हौसला भी उसका ही होगा

शरीर उसका है
तो उस पर हक़ भी उसका ही होगा?

कभी माँ बाप या भाई की दुहाई दे कर
तो कभी समाज के तराजू में उसे कब तक तोलते रहोगे?

आदमी औरत की शारिरिक भिन्नता
का जुमला कब तक गाते रहोगे?

अपने घर की इज़्ज़त का बोझ
कब तक उसके कंधे डालते रहोगे?

नज़र और नज़रिये में दोष तुम्हारा है
उसका कसूरवार उसे कब तक ठहराते रहोगे?

शरीर उसका है
तो उस पर हक भी उसका ही होगा

आखिर कब तक तुम उस पर हक जताते रहोगे?

 © अपूर्वा बोरा

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