इल्ज़ाम

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रात के अंधेरे में निकली जगमग जुगनुओं की बारात
क़सूर था बादलों का जिसने ढाँप लिया पूरा आसमान
और हमने बेवज़ह ही चाँद के फ़र्ज़ पर लगा दिया इल्ज़ाम

मई के महीने की दोपहर में हुई बिन मौसम बरसात
क़सूर था बंजर ज़मीन का जिसने किया फ़सल का नुक़सान
और हमने बेवज़ह ही बारिश के इरादों पर लगा दिया इल्ज़ाम

मंजिल की राहों में कठिनाइयों का बोझ था बोहतात
क़सूर था झिझक का जिसने बढ़ते कदमों को लिया थाम
और हमने बेवज़ह ही इन हालातों पर लगा दिया इल्ज़ाम

किसी के आगोश में गुज़रे थे सदियों से लंबे लम्हात
क़सूर था दिल का जिसने ग़ैर को बनाया अपना मेहमान
और हमने बेवज़ह ही अपनों की वफ़ा पर लगा दिया इल्ज़ाम

आग के दरिया में कूदे थे जज़्बातों से हो कर मोहतात
क़सूर था इश्क़ का जिसने तैरने वाले को डुबाया सरेआम
और हमने बेवज़ह ही हाथ की लकीरों पर लगा दिया इल्ज़ाम

दोस्तों की महफ़िलों में मिली तन्हाई की ये सौगात
क़सूर था तुम्हारा जिसने कसमें- वायदे तोड़े तमाम
और हमने बेवज़ह ही मोहब्बत पर लगा दिया हर एक इल्ज़ाम

© अपूर्वा बोरा​

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