इन दिनों

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इन दिनों
खिड़की में
पर्दे की ओट से
छनी हुई धूप से
बदन को सेक रही
हूँ और फ़िर उन्हीं
उजली किरणों से
आँख मिचौली
खेलने के लिए
मुख को हाथों
से ढाँप रही हूँ

इन दिनों
रेडियो में
मुकेश के गीत
की पंक्तियों के
बीच धुन बज
रही है और उस
संग ताल से ताल
मिलाते हुए मैं फ़िर
हाथों का माइक
बना कई बेसुरे
राग अलाप रही हूँ

इन दिनों
हफ्ते में
आजकल इतवार
का पता नहीं चल
पाता बेख़बर हर
रोज़ ही आराम
फ़रमा रही हूँ और
सभी घरों की इसी
दिनचर्या को फ़िर
अपनी निगाहों
से भाँप रही हूँ

इन दिनों
दुनिया में
कोरोना का ये
प्रकोप फैलता
देख मानवजाति
भी घबरा रही है
और सामाजिक
दूरी स्वंय अपना
भीतर ही भीतर
औरों के लिए भय
से काँप रही हूँ

इन दिनों
घर में
सूरज को सुबह
उदय होते फ़िर
सांझ तलक ढलते
देख रही हूँ और
इस वक़्त और
इन हालतों में बस
सबकी सलामती
की दुआ का लबों
से जाप रही हूँ

घर की चाहरदीवारी
में सुरक्षा के पैमाने
नाप रही हूँ
मैं इन दिनों अपना
हाल कुछ ऐसे ही
माप रही हूँ।

© अपूर्वा बोरा​

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