इंकार

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जितनी बार 
उनकी ओछी नज़रें
मेरे बदन को छलनी कर
मेरे औरत होने के अभिमान को
एक अभिशाप पुकारेंगी
उतनी बार कहूंगी
इंकार है मुझे

जितनी बार
उनकी कर्कश ज़ुबाँ
मेरे चरित्र का मखौल उड़ा
मेरी आज़ादी की परिभाषा को
अपने तराजू में तोलेंगी
उतनी बार कहूंगी
इंकार है मुझे

जितनी बार
उनकी कठोर हथेलियां
मेरी निजता का दायरा लांघ
मेरे परिवार की इज़्ज़त को 
मेरे यौन अंगों में खोजेंगी
उतनी बार कहूंगी
इंकार है मुझे

जितनी बार
उनकी छोटी सोच
मेरी इच्छाओं का गला घोंट
मेरे आगे बढ़े कदमों को
पीछे खींचती रहेंगी
उतनी बार कहूंगी
इंकार है मुझे

जितनी बार
उनकी ख़राब नियत
मेरी ज़िन्दगी में तूफान ला
तुमने ना क्यों नहीं कहा
जैसे सवाल उठाएंगी
उतनी बार कहूंगी
इंकार है मुझे

हर बार
और बार बार
कहूंगी
इंकार है मुझे।

 © अपूर्वा बोरा

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