इश्क़

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मैं किताब के पन्ने पलट रही थी
जब इश्क़ मेरे बगल से गुज़रा था।

न कोई सुर ताल की आवाज़ आई
न ही हवाओं का रुख बदला था।

रास्ते में हर गुज़रने वाले से टकराता
वह अपनी धुन में इतना खोया था।

मैं उसे देखकर खिलखिलाने लगी
और वो भी नज़रें मिला रहा था।

कुछ हलचल तो ज़रूर हुई थी दिल में
लेकिन कोई सुरूर सा न छाया था।

मैंने तो इश्क़ को देख लिया था
पर मेरा दोस्त नहीं देख पाया था।

शायद इसीलिये हमारी कहानी में हम दो तो थे
पर हमारा दिल एक नहीं हो पाया था।

खैर इश्क़ का सफ़र आसान तो नहीं होता
यही सोचकर हमने अपने इत्मिनान को आज़माया था।

अरसे बीत गए लेकिन वह न आया
जब आया तो उसने एक सवाल उठाया था।

आखिर इश्क़ को पहचाना कैसे?
न संगीत, न ताज़ा हवा, न वह लाल रंग में आया था।

मैंने कहा, किसी चित्रकार का कैनवास देखा है?
कोरे कागज़ ने कैसे हर रंग को अपनाया था।

जब इश्क़ का मुझसे सामना हुआ
न संगीत, न ताज़ा हवा, न लाल रंग में वह आया था।

क्योंकि इश्क़ का रंग तो सफेद है दोस्त,
आखिर उसने भी जुनून के हर रंग को अपनाया था।

 © अपूर्वा बोरा

This Post Has 10 Comments

  1. Deepak Rudra Paul

    बहुत खूब

  2. Raju

    वाह जी वाह , बहुत खूब।

  3. Pushpa

    Bahut bariya likkha hai.God bless U.

  4. Ishadeep

    Beautifully written

  5. PRIYANKA PARIHAR

    wow! u write so beautifully!

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