जब मैं

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मेहनत के पसीने में भीग कर
हाथ की रेखाएं धुल गई
बादल भी उस रोज़ बरसा
जब मैं छतरी घर में भूल गई।

घर के दीये में उम्मीद की
आख़िरी बाती भी जल गई
लौ भी उस रोज़ बुझी
जब मैं मोम की भांति पिघल गई।

आज के बोझ तले खुशियाँ
कल के भरोसे टल गई
छाँव भी उस रोज़ मिली
जब मैं मीलों धूप में चल गई।

विपरीत परिस्थितियों में जन्मी
फ़िर उन्हीं में पल गई
वक़्त भी उस रोज़ बदला
जब मैं उन हालातों में ढल गई।

© अपूर्वा बोरा​

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