जुमला

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‘हाँ सब ठीक है’ का जुमला सब से कहता ही रहा
ख़्वाबों की ख़ातिर अपनी नींदों से भी लड़ता ही रहा

कभी दिल की कभी यार की नाराज़गी सहता ही रहा
मोहब्बत की राहों में मैं भी ताउम्र भटकता ही रहा

वो सुकून जो उसकी नज़दीकियों से मिलता ही रहा
उसकी तलाश में जाने कहाँ कहाँ मैं फिरता ही रहा

एक गोद से चार कंधों तक का समय घटता ही रहा
बेहतर जीवनशैली की होड़ में जीवन भी कटता ही रहा

दुनिया के मायाजाल में मैं बस उलझता ही रहा
ये समाज के दायरों में भी आये दिन बँटता ही रहा

बारिशों का सिलसिला था या बादल गरजता ही रहा
धूप छाँव की लुकाछिपी में मैं भी बस चलता ही रहा

निराशा का एक झरोखा इन आँखों में खुलता ही रहा
आत्म सन्देह की चादर से भी ख़ुद को ढकता ही रहा

घर से निकला तो सफ़र में रास्ता नया जुड़ता ही रहा
कँधों पर जिम्मेदारी का बोझ आहिस्ता बढ़ता ही रहा

‘हाँ सब ठीक है’ का जुमला सब से कहता ही रहा
ख़्वाबों की ख़ातिर अपनी नींदों से भी लड़ता ही रहा।

© अपूर्वा बोरा​

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