कैसा प्यार निभाओगे?

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किसी रोज़ तुम
मेरी नम आँखों
को देखते हुए भी
मेरे अंदर के गुबार
को माप नहीं पाओगे
तन्हाई में आँसू बहाने
के बाद जब मेरी आंखें
एक दिन तुम्हें छलना
सीख जाएंगी तब अगर
तुम कंधा और रूमाल
लिए मेरे करीब बैठे भी
रहोगे तब भी काफी नहीं होगा
गर दुख में साथ नहीं दे पाओगे
तो फिर कैसा प्यार निभाओगे?
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किसी रोज़
मेरी दुखती रग
को दबाते हुए भी
मेरी उत्कंठा के उफ़ान
को माप नहीं पाओगे
तन्हाई में ख़ुद को संभालने
के बाद जब मेरी रगें
एक दिन तुम्हें छलना
सीख जाएंगी तब अगर
तुम बाहें और ह्रदय
खोल मेरे करीब बैठे भी
रहोगे तब भी काफी नहीं होगा
गर दुख में साथ नहीं दे पाओगे
तो फिर कैसा प्यार निभाओगे?
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किसी रोज़
मेरे धड़कते दिल
को सुनते हुए भी
मेरे बिखरने का दर्द
माप नहीं पाओगे
तन्हाई में ख़ुद को समेटने
के बाद जब मेरी धड़कनें
एक दिन तुम्हें छलना
सीख जाएंगी तब अगर
तुम वक़्त और मंशा
लिए मेरे करीब बैठे भी
रहोगे तब भी काफी नहीं होगा
गर दुख में साथ नहीं दे पाओगे
तो फिर कैसा प्यार निभाओगे?
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किसी रोज़
ये पल दोहराने
के काफी बाद ही
अपनी ग़ैरमौजूदगी को
माप तुम पाओगे
तन्हाई में मुझे तलाशने
के बाद जब मेरी कमी
एक दिन तुम्हें खलना
शुरू हो जाएगी तब अगर
तुम माफ़ी और मौका
माँगने मेरे करीब बैठे भी
रहोगे तब भी काफी नहीं होगा
गर दुख में साथ नहीं दे पाओगे
तो फिर कैसा प्यार निभाओगे?

© अपूर्वा बोरा​

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