कैसे बचा पाती?

Photo by Min An from Pexels

फिसला होता तो तुम हाथ दे
शायद मुझे संभाल पाती
मग़र ज़िंदगी की डगर
मेरे हालातों के कारण
थोड़ी ऊबड़खाबड़ है
एकाएक मौसम के
बिगड़ जाने से
मैं जो गिर पड़ा हूँ
अब तमाम ज़िंदगी
खुद को उठाने में
व्यतीत हो जाएगी

फिसला होता तो तुम हाथ दे
शायद मुझे संभाल पाती
मगर जो हालातों से हार गया
तुम कैसे उसे बचा पाती?

टूटा होता तो तुम संयम से
शायद मुझे जोड़ पाती
मग़र ख़्वाबों का घर
मेरे हालातों के कारण
तिनकों पर खड़ा है
एकाएक आँधी की
चपेट में आ जाने से
मैं जो बिखर पड़ा हूँ
अब तमाम ज़िंदगी
खुद को समेटने में
व्यतीत हो जाएगी

टूटा होता तो तुम संयम से
शायद मुझे जोड़ पाती
मगर जो आँधी से घिर गया
तुम कैसे उसे बचा पाती?

भटका होता तो तुम राह
शायद मुझे दिखा पाती
मग़र अपनों का रिश्ता
मेरे हालातों के कारण
कच्ची डोर से जुड़ा है
एकाएक परिवार की
नींव हिल जाने से
मैं जो उजड़ पड़ा हूँ
अब तमाम ज़िंदगी
खुद को बसाने में
व्यतीत हो जाएगी

भटका होता तो तुम राह
शायद मुझे दिखा पाती
मगर जिसकी नींव हिल गई
तुम कैसे उसे बचा पाती?

जिया होता तो तुम संग मेरे
शायद वक़्त और बिता पाती
मग़र मजबूरियों का बोझ
मेरे हालातों के कारण
बढ़ता ही जाता है
एकाएक कंधों के
जवाब दे जाने से
मैं जो पराजित पड़ा हूँ
अब तमाम ज़िंदगी
खुद से जीतने में
व्यतीत हो जाएगी

जिया होता तो तुम संग मेरे
शायद वक़्त और बिता पाती
मगर जो ख़ुद से ही हार गया
तुम कैसे उसे बचा पाती?

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply