कैसे?

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झाँकती है आँखों के ज़रिए रूह में जो
उससे भीतर का हाल छिपाओगे कैसे?
अंधेरी रातों में सितारों का इंतज़ार है जिसे
उसे चंद जुगनुओं से बहलाओगे कैसे?

ढूंढती है मौसम की अटखेलियों में मौसीक़ी जो
उसे हुज़ूर की महफ़िलों में बुलाओगे कैसे?
गलियों और कूचों की सरोकार है जिसे
उसे ऊँची इमारतों से लुभाओगे कैसे?

बनती है लौ राह के दीपक की जो
उसकी शमा बुझाओगे कैसे?
इक सुकून की दरकार है जिसे
उसे मंज़िल से भटकाओगे कैसे?

करती है बग़ावत ज़माने के दस्तूर से जो
उसके ख़यालों पर पहरा लगाओगे कैसे?
अपनी आज़ादी पर इख़्तियार है जिसे
उसे पितृसत्ता की डोर से बांध पाओगे कैसे?

झाँकती है आँखों के ज़रिए रूह में जो
बोलो उससे भीतर का हाल छिपाओगे कैसे?

© अपूर्वा बोरा​

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