कस्तूरी - पहला अध्याय

कस्तूरी मृग की कहानी तो आपने सुनी ही होगी कि कैसे जिस सुगंध की तलाश में वह पूरा जंगल विचरता था, उसी में समाई हुई थी।

यह कहानी कुछ वक़्त पुरानी है। कितनी पुरानी या किस गांव या शहर में बसी है, यह तो हम कहानीकार अपनी मर्ज़ी से बदलते रहते हैं। अब आप अगर इज़ाज़त दें तो इतनी गहराई में ना जा कर, सीधे मुद्दे पे आते हैं।

इस कहानी की मुख्य किरदार है कस्तूरी। रंग साँवला, बिखरे बाल और कत्थई से होंठ। इसे सुनते ही पहला चित्र जो आँखों के सामने आया होगा, उससे काफी अलग थी कस्तूरी। मुख पे खामोशी और आँखों में भावनाओं का सैलाब। पहली नज़र में याद नहीं रहती थी और भीड़ में भी बड़ी आसानी से खो जाया करती थी। कभी उससे मिले भी होगे तो भी बड़ी मशक्कत के बाद याद कर पाओगे, ऐसी गुमनाम थी कस्तूरी।

लेकिन सुना है कि एक अलग ही जादू था कस्तूरी में। मैंने तभी पहली बार उसका ज़िक्र सुना था। यही जादू देखने मैं अगली गाड़ी पकड़ उससे भेंट करने चला आया। सवेरे पहुंच कर मैं नुक्कड़ में लखन की दुकान पर चाय पीने गया। लखन भाई से हाल चाल की बात करते करते मैं आखिर पूछ ही बैठा कि कस्तूरी के जादू का किस्सा क्या है? हँसते हँसते बोले मुझसे कि अभी तो बगल से गुज़री आपके, आपने ध्यान नहीं दिया क्या? मैं कांच का गिलास वहीं रख उसी दिशा की ओर मुड़ गया जहाँ लखन ने इशारा किया था।

मेरे हाँफने की आवाज़ सुन कस्तूरी ने अपने कदमों की गति धीमी कर दी।

क : कहिये, कैसे आना हुआ आपका?
मैं : जी, आप मुझे जानती हैं?
क : क्या आप मुझे जानते हैं?
मैं : जानने के लिए ही तो आया हूँ।
क : जी?
मैं : मैं आवाज़ पत्रिका का लेखक हूँ। शायद कभी ज़िक्र सुना हो?
क : अच्छा, तो आप हैं हमारे गाँव की आवाज़। बताइये कैसे आना हुआ आपका?
मैं : दरअसल चर्चा में सुना कि आपकी सोच बाकी सबसे काफी अलग है, बस वही जानने के इरादे से आना हुआ।
क : अच्छा जी। कहिये कब मुलाकात करेंगे?
मैं : जब कहो। अभी ही कर लें, कहो तो।
क : अरे आप घर जाइये, कुछ खा पी लीजिये। फिर मिलते हैं।
मैं : कहाँ मिलोगी?
क : बस मिल जाऊँगी।

और इतना कहते ही पल में आँखों से ओझल हो गयी।

कस्तूरी - दूसरा अध्याय

मैं भी सफर से थका हारा, दोपहर की धूप में आंगन में खाट डाल कर लेट गया। नींद खुली तो देखा कस्तूरी पंखा कर रही है, खुद को। मैंने जम्हाई ली और उठ कर बैठ गया, पूछा तो पता चला कि घण्टे से बैठी हुई है। 

मैं : आई थी तो उठा देती, खाली क्यों बैठी रही?
क : खाली कहाँ बैठी थी, मैं तो सोच रही थी कि आपसे क्या क्या बातें करनी हैं।
मैं : अच्छा जी। चलो बताओ फिर, क्या कहानी है ये कस्तूरी के जादू की?
क : आप तो लेखक हैं, आप ही बताइये कि क्या कोई कहानी की इतनी फीकी शुरुआत होती है? चाय की चुस्कियां लेते हुए जो किस्से न सुनाये तो वो भी भला कोई किस्से हुए?
मैं : अच्छा जी। चलो तुम बैठो, मैं चाय लेके आता हूँ।
क : अब फीकी चाय में क्या मज़ा, साथ में नारियल वाले बिस्कुट भी लेते आना।
मैं : और कुछ साहिबा? कहें तो भोज लगा दूँ आपकी खिदमत में?
क : कहूँगी तो लगा देंगे क्या?

बस हँसी ठिठोली में वो दोपहर हमने दोस्ती करने में बिता दी। दोस्ती में क्या होता है कि इंसान अक्सर चेहरे के ऊपर के नक़ाब उतारने लगता है। अब कस्तूरी का जादू महसूस करने के लिए उसके उतने करीब जाना ज़रूरी था, आप समझ तो रहे हैं न।
खैर सूरज ढलते ढलते एक बात तो मैंने ग़ौर कर ली थी। जो सवाल मैं पूछने से कतराता था कस्तूरी उन्हीं के जवाब दिया करती थी। तीन शब्दों में उसकी छवि बताऊँ तो, बेबाक, बंजारन और उसका पसंदीदा शब्द बदचलन। हर शब्द के पीछे एक कहानी है। इज़ाज़त दें तो मैं व्याख्यान करूँ।

कस्तूरी - तीसरा अध्याय

(बेबाक)

कुछ बारह साल की उम्र होगी कस्तूरी की जब उसे अपना पहला मासिक हुआ। आम तौर पर इसे लड़कियों की परेशानी का नाम देकर आदमी इससे जुड़े वाद विवाद से कन्नी काटा करते हैं। खैर उस रोज़ कस्तूरी अपने घर के आंगन में धम से बैठ गयी और सिसकियां लेने लगी। उसके रोने की आवाज़ सुन उसका भाई बंसी और उसकी माँ दौड़े चले आये। 

क : अरी रोती क्यों हो?
बंसी : क्या हो गया पगली? किसने मारा, अभी मज़ा चखाता हूँ उसको। तू बता तो सही।
क : माँ शायद मुझे कोई बीमारी है।
माँ : बीमारी? हाय। क्या हुआ? चोट लगी क्या?
क : ऐसे तो कहीं गिरी नहीं, चोट भी नहीं दिखती फिर भी न जाने क्यों खून बह रहा है।
माँ : अरे बंसी, तू अंदर जाके खेल। मैं हूँ न कस्तूरी के साथ।
बंसी : कैसी बात करती हो माँ? इसके खून बह रहा है और मैं खेलूं? कस्तू दिखा कहाँ से बह रहा है?
माँ : अरे ये हम औरतों वाली बातें हैं। तू नहीं समझेगा अभी।
क : माँ औरतों वाली बातें? आपको भी बीमारी है क्या?
माँ : नहीं रे। अब तो तू बड़ी हो गयी है कस्तू।
क : बड़ी हो गयी? और कितनी बड़ी हुँगी माँ? बंसी भैया से भी लंबी हूँ मैं तो।
माँ : अर्रे। अंदर से बड़ी हो गयी है बेटा। अब तू बच्ची नहीं रही।
क : मतलब अब मैं अकेले घूमने जा सकती हूँ?
माँ : नहीं।
क : तो फिर, बाल खुद संवार सकती हूँ?
माँ : नहीं।
क : तो फिर, खोखो खेल सकती हूँ?
माँ : नहीं।
क : अरे तो क्या फायदा बड़े होने का, अगर कुछ भी नहीं कर सकती।
माँ : किसने कहा कुछ नहीं कर सकती। अब तो तू माँ बन सकती है।
क : मतलब, मैं जन्म दे सकती हूँ लेकिन घूम नहीं सकती, खुद को संवार नहीं सकती और खेल भी नहीं सकती?
माँ : कितनी बहस करती हो। चलो जाके दुकान से इस नाम का पैड खरीद लाओ।
क : पैड का क्या करूँगी? लिखना है क्या ये सब?
माँ : कॉटन का पैड खून सोख लेगा, और बाकी का सब मैं तुझे समझा दूंगी। तू ला तो सही।
क : बंसी से मंगा लूँ? मेरे पेट में तो मानो कोई सुई चुभा रहा हो।
माँ : अर्रे। हम औरतों की बातें है, भला कोई अपने भाई से ऐसी बातें थोड़े ही करता है।
क : तो तुम अपना वाला दे दो।
माँ : मेरी तो उम्र ऊपर हो गयी बेटा, मुझे अब मासिक नहीं होते। अब जा जल्दी से ले आ वरना कपड़े में दाग रह जाएगा।
क : अभी आई।

 

क : नमस्ते काका, ये वाला पैड देना।
काका : नमस्ते नमस्ते। अरे हमारी बिटिया तो बड़ी हो गयी है। ये लो।
क : ये इतना छुपा के क्यों दे रहे हो काका? सबको तो पता ही है न।
काका : अरे बिटिया ऐसी बातें कोई खुले में करता है क्या?

क : अरे मीनाक्षी तू ये मंदिर के बाहर क्यों बैठी है? आज आचार्य जी का पाठ नहीं सुन्ना क्या?
मीनाक्षी : आज मैं मंदिर के अंदर नहीं जा सकती।
क : क्यों?
मीनाक्षी : मेरा मासिक का दूसरा दिन है न, इसलिए।
क : अरे, तो क्या हुआ? किसी ने मना किया है क्या?
मीनाक्षी : हाँ माँ ने।
क : चल चलते हैं। मुझे भी आज से शुरू हुए हैं। कोई कुछ बताता ही नहीं, बस इशारों में ही चलती हैं इनकी बातें। तू सब बता मुझे।
मीनाक्षी : देख माँ कह रही थी कि अब हमे लड़कों से दूर रहना चाहिए। हाथ पकड़ने से कभी भी गर्भवती हो सकते हैं। और खेल कूद भी कम करने होंगें, क्योंकि कभी भी कुछ भी हो सकता है?
क : कुछ भी हो सकता है?
मीनाक्षी : अरे कस्तूरी, तूने पैड लगाया नहीं क्या? तेरी सलवार में तो दाग बन गया है।
क : समझ नहीं आ रहा कि कहाँ लगेगा ये? पट्टी की तरह बाँधू क्या?
मीनाक्षी : यहाँ से चल, मैं बताती हूँ। किसी ने देख लिया तो बहुत हंगामा होगा।
क : हंगामा क्यों होगा?

अपनी ही बातों में मशगूल सहेलियों ने किसी के आने की आहट नहीं सुनी। जब किसी ने नाम से पुकारा तो दोनों हक्की बक्की वहीं खड़ी रह गईं। कस्तूरी की माँ की आँखों से तो शोले गिर रहे थे।

माँ : कितनी देर हो गयी तुम्हें बाज़ार भेजे हुए? और तुम यहाँ सहेली से गप्पें मार रही हों? चलो यहाँ से।
क : लेकिन माँ मैं बस पूछ रही थी कि मासिक में क्या करना होता है और क्या नहीं।
माँ : मैं हूँ न। मुझसे पूछ लो। ऐसी बातें हर किसी से थोड़े की जाती हैं। वो भी मंदिर में। अच्छा हुआ किसी ने देखा नहीं, वरना मंदिर की सीमा का शुद्धिकरण करना पड़ता।
क : शुद्धीकरण क्यों? मैंने गंदा थोड़े ही किया था?
माँ : समझती क्यों नहीं, मासिक औरतों की बात है। इन दिनों में हम सभी पूजा के स्थलों से दूर रहते हैं।
क : और जो गाय गोबर कर देती है मंदिर के प्रांगण में, उसका कुछ नहीं?
माँ : कहाँ से ऐसी बातें सीखती है कस्तू, गाय तो माँ समान होती है। उसका क्या शुद्ध अशुद्ध।
क : तुम्हारी बातें मेरी समझ से बाहर हैं माँ। अगर मासिक होने से मैं माँ बनने योग्य हूँ, तो इस हिसाब से तो मुझसे पवित्र कोई और नहीं।

बंसी : क्या हुआ माँ तुम और कस्तू इतना लड़ क्यों रहे हो?
माँ : कुछ नहीं बेटा। हम औरतों की बातें है, तू बीच में नहीं पड़।
बंसी : कस्तू तेरे दर्द तो नहीं न? चल खेलते हैं, तेरा ध्यान बंटेगा।
क : अरे बंसी भैया, आप मेरा हाथ नहीं पकड़ो नहीं तो मैं गर्भवती हों जाउंगी।
माँ : राम राम। कैसी बात करती है कस्तूरी। कहाँ से सुनके आई ये?
क : मीनाक्षी की माँ बता रही थी उसे, कि मासिक शूरु होने के बाद लड़कों से दूर रहना चाहिए वरना हाथ पकड़ने से गर्भवती हो जाते हैं।
माँ : लेकिन बंसी तेरा भाई है।
क : लड़का भी तो है। अब हाथ से थोड़े पता चलेगा कि भाई बहन हैं, सावधानी तो बरतनी पड़ेगी न।

बंसी : अरे पगली इधर आ। मैं समझाता हूँ तुझे सब। पिछली कक्षा में ही सिखाया था हमे, और इस विषय में तो मैं अव्वल भी आया था।
माँ : बंसी, बेटा हम औरतों की बातों में..
क : माँ तुम रहने दो। भैया चलो सिखाओ मुझे।

बस कस्तूरी ने बंसी से दुनिया भर के सवाल पूछे और सीख कर मीनाक्षी को, आशा को और सभी लड़कियों को सिखाया कि मासिक तो कुदरती प्रकिया है, अभिशाप नहीं। और साथ में यह भी कि गर्भवती होने के लिए केवल हाथों का नहीं और अंगों का मिलना भी ज़रूरी होता है।

जितने जवाब कस्तूरी को मिलते रहते उतने ही उसके सवाल बढ़ते रहते। उस छोटे गांव में शायद ही किसी ने ऐसी वाली बातें की होंगी। और विस्मय में डालने वाली बात यह थी कि ऐसी बातें निकली भी तो एक लड़की के मुख से। बेबाक थी कस्तूरी। सवाल कितना भी टेढ़ा अजीब या असुविधाजनक हो औरों के लिए, कस्तूरी बेधड़क पूछ बैठती थी।

कस्तूरी - चौथा अध्याय

बंजारन

मैं : तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?
क : हाँ हुआ है।
मैं : कब हुआ?
क : होता रहता है।
मैं : मैं कुछ समझा नहीं। किससे होता रहता है?

क : मुझे लोगों से ज़्यादा उनके साथ बिताये वक़्त से प्यार होता है। जो पल बीत गए वो यादों में कैद हैं और जो पल बीतेंगे वो कल यादें बन जाएंगे। आज का अभी का जो पल है, इसमें तुमसे प्यार है।
मैं : मुझसे प्यार है? पर तुम तो मुझे जानती भी नहीं।
क : अरे बाबा, जान गयी तो प्यार करना उतना मुश्किल भी हो जाएगा न। ज़रा सोचो कि हम प्यार किसे कहते हैं? जिसके साथ वक़्त बीतने का पता नहीं चलता। या जिसके चेहरे से नज़र नहीं हटती। या शायद जिसके सारे सुख दुख बांटने का जी करता है। इन्हीं कुछ सुनिश्चित बातों से तो प्यार को मापा जाता है न?
मैं : हाँ बात तो सही है कस्तूरी, लेकिन हर रोज़ किसी नई चीज़ से दिल लगाने वाली से कोई प्यार क्यों करेगा?
क : क्योंकि उसे भी आज़ादी है। दोपहर से आपके आंगन में बैठे हैं, अब रात होने को आई है फ़िर भी मेरा उठने का जी नहीं करता। न ही आप मुझे जाने को कह रहे हो, जबकि आप अच्छे से जानते हो सांयकाल के पश्चात गांव की हर लड़की अपने घर के भीतर ही रहती है। भला ऐसा क्यों है? आपको मेरा साथ अच्छा लग रहा है, है न? ठीक वैसे ही जैसे मुझे आपका साथ। फर्क सिर्फ इतना है कि मैं यह कहने से डरती नहीं कि इस क्षण आपसे अनमोल मेरे लिए कोई और नहीं। शायद कल किसी और के आंगन में उससे बतियाते हुए मेरे लिये सबसे अनमोल वही हो। मगर क्या करूँ दोस्त, ऐसा कहने वाली लड़की को किस नाम से पुकारते हैं आपको तो पता ही है।

 

 

मैं : यह ठीक है। अपनी ही मर्ज़ी से दिल लगाती हो, और फ़िर बड़ी बेरुखी से मुख मोड़ भी लेती हो। मैं घर छोड़ देता हूँ तुम्हें, चिंता मत करो। भला एक मुलाक़ात में भी प्यार होता है? चलो।
क : तभी तो मैंने कहा कि मुझे प्यार वक़्त से होता है। अच्छा बुरा कैसा भी वक़्त हो, कुछ नए एहसास हमेशा देके जाता है। वक़्त बीत जाने का जब गिला नहीं होता, तो प्यार बीतने में गिला करने का क्या फायदा? इतना प्यार है मेरे दिल में कि पूरे गांव पे लुटा दूँ, मगर क्या करूँ दोस्त, ऐसा कहने वाली लड़की को किस नाम से पुकारते हैं आपको तो पता ही है।
मैं : तो किसी एक से कभी दिल नहीं भरा? शायद तुम्हें सही शक़्स ही न मिला हो।
क : हो सकता है, मगर प्यार कभी कम नहीं पड़ता। जितने चेहरों से, पलों से, आवाज़ों से प्यार हुआ है मुझे, वो कभी भुलाये नहीं मैंने। आज भी सबसे मोहब्बत है, मगर क्या करूँ दोस्त, ऐसा कहने वाली लड़की को किस नाम से पुकारते हैं आपको तो पता ही है।

 

मैं : और जो भी पुकारते हों, मैं तो तुम्हें बंजारन कह कर पुकारूंगा।
मैं : बंजारन हो तुम। समझती हो इसका मतलब?
क : यही कि जिसका कोई एक घर या मकान नहीं होता।
मैं : नहीं, जो सबका होते हुए भी किसी एक का नहीं होता। समझी?
क : हाँ। यही न कि जो खुद का हो गया, वो और किसी का नहीं होता।

कस्तूरी - पांचवा अध्याय

बदचलन

अगली सुबह नाश्ते पे मुझे कस्तूरी के घर से बुलावा आया। मक्ख़न रोटी के साथ चाय पी सका था कि उसके घरवाले मुझे घेर कर बैठ गए।

घरवाले : आपकी पत्रिका पढ़ी है हमने, काफी खुले विचार हैं आपके।
मैं : जी मैं तो केवल शब्द देता हूँ, विचार तो आप लोगों से ही आते हैं।
घरवाले : कस्तूरी के विचार थोड़े अलग हैं हमसे, इसी वज़ह से हमारी एक चिंता है, आप कहें तो प्रस्तुत करें।
मैं : जी इसमें पूछना कैसा। कहिये क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी?
घरवाले : दरअसल, कस्तूरी बीस वर्ष की हो चुकी है। उसके लिए रिश्ते आना भी शुरू हो गए हैं। हमें ये चिंता खाये जा रही है कि अगर आपकी पत्रिका में उसके विचार छप गए, तो कहीं रिश्ते आना बंद न हो जाए।
मैं : ऐसा क्यों लगता है आपको? क्या पता जो रिश्ते उसे पढ़के आये, वे वास्तविकता में कस्तूरी को बेहतर समझें। और उससे भी पहले, क्या आपको लगता है कस्तूरी शादी में बंधने के लिए तैयार होगी?
घरवाले : बात उसकी नहीं है, गांव में लोग पीठ पीछे नाम रखते हैं। ऐसे में जितनी जल्दी वो यहाँ से बाहर जाए उसके लिए उतना बेहतर होगा।
मैं : बंसी के पास शहर भेज दीजिये फ़िर। कस्तूरी की सोच बड़ी है, आप सहयोग देंगे तो शायद कुछ बड़ा कर दिखाए।
घरवाले : बंसी तो दोस्तों के साथ किराये पे रहता है, जवान लड़के हैं वहाँ। कभी ऊँच नीच हो गयी तो सोचना तो पड़ता ही है।
मैं : तो आप मुझसे क्या चाहते हैं?
घरवाले : ये विचार आप अपने नाम से छाप दीजिये। कस्तूरी को इन सबसे दूर रखिये, बाकी हम देख लेंगे।
मैं : मुझे कस्तूरी से बात करनी है।
घरवाले : वो छत में होगी शायद।

 यह तो होना ही था। बहुत खुले विचार हैं कस्तूरी के। कल जब उसे घर छोड़ने गया था तो रास्ते में कहानियां बता रही थी। कैसे अनजान गलियों में अनजान लोगों के साथ वक़्त गुज़ारती थी। मैंने जब पूछा कि डर नहीं लगता तो बोली लगता है, पर इंसानियत पर भरोसा भी तो ऐसे ही होगा। अजीब तरीके थे उसके, पर नियत साफ थी। कहानियों की लत थी उसे, बैठकर घंटों सिर्फ कहानियां सुन सकती थी, बुन सकती थी और सुना सकती थी। गांव में तो खबर फैलनी ही थी, लोग बढ़ने लगे। कस्तूरी के जादू की ख़बर फैलती रही, जैसे मुझ तक पहुंची, वैसे न जाने कितनो तक पहुँची होगी। क्या करूँ दोस्त, जो लड़की गैरों के साथ इतना वक़्त बिताती होगी, उस लड़की को किस नाम से पुकारते हैं आपको तो पता ही है। 

और बस यही है तीसरे शब्द की कहानी, बदचलन।

कस्तूरी - अंतिम अध्याय

हाँ लेकिन, एक दफ़े जो मुलाकात कर ली तो कस्तूरी को भुलाया नहीं जाता। अब तुम कहोगे कि शुरआत में तो कहा था की गुमनामी है कस्तूरी। अब याद हो गयी तो गुमनाम कैसे? तो भाई, कस्तूरी एक से ज़्यादा बार मिलती ही नहीं थी। एक वक़्त गुज़रने के बाद वो ओझल हो जाती थी, उसका एहसास रहता था लेकिन चेहरा यादों की पिटारी में कहीं खो जाता था।
मैं डरता था। कस्तूरी मेरी तो नहीं थी, फिर भी उसे खोने से डरता था।
आजकल मानवों के जंगल में बातचीत के मोहताज़ हैं हम, विचार हैं पर कोई सुनने वाला नहीं, शब्द हैं पर कोई पढ़ने वाला नहीं। बड़े दिनों बाद ऐसा आत्मिक मिलन हुआ था। अब जो मिलन हुआ तो बिछड़े जाने का डर फ़िर घर कर गया।

मैं : आज भी प्यार करती हो मुझसे?
क : करती हूँ।
मैं : कब तक कर सकती हो?
क : हमेशा।
मैं : सिर्फ़ मुझे?
क : पता नहीं।
मैं : पता है न तुम्हारे घरवाले तुम्हारी शादी की बात कर रहे हैं। क्या सोचा है?
क : भाग जाउंगी।
मैं : भाग जाओगी? मोह नहीं अपने परिवार से?
क : बहुत मोह है, पर बंजारन हूँ न, एक जगह दिल लगता ही नहीं।
मैं : मेरे साथ चलो, आज़ादी दूंगा।
क : तुम कौन हो आज़ादी देने वाले? तुम्हें आज़ादी किसने दी?
मैं : कैसी आज़ादी?
क : जीने की।
मैं : किसी ने नहीं।
क : तो मुझे जीने की आज़ादी कोई और क्यों देगा?
मैं : ज़िद करती हो, ऐसे कैसे चलेगा। कभी तो ठहरने का दिल करेगा, तब नया आसरा कहाँ ढूंढती फिरोगी?
क : नहीं ढूंढूंगी। जब ठहरने का दिल करेगा, ठहर जाउंगी। मेरी ज़िन्दगी जीना कोई और कैसे सिखा सकता है?
मैं : तो क्या इरादा है?
क : सोचती हूँ तुम्हारे साथ चलूँ, फिर वहाँ नई शुरआत करूँगी। नया घर, नया काम और नया प्यार।
मैं : वही तो मैंने कहा, मेरे साथ चलो। खाली बहस कर रही थी।
क : अरे। मैंने कहा मैं वहाँ अलग रहूंगी, यहाँ घरवाले सुकून में जियेंगे कि आपके साथ हूँ। आप सुकून में रहोगे, क्योंकि मैं दूर रहूंगी और मैं सुकून में रहूंगी क्योंकि नया घर, नया काम और नया प्यार।
मैं : ये तो तुम मेरा फायदा उठा रही हो।
क : तो आप किस इरादे से साथ ले जा रहे थे? देखो, ज़िन्दगी जो है वो बहुत कुछ सिखा देती है। यहाँ सब अपना सोचते हैं, जो ठीक भी है। तो इस तरीके से, न आपका कुछ बिगड़ा न मेरा।
मैं : क्या करोगी शहर जाकर? कुछ सोचा है?
क : कहानियां लिखूंगी। कहानियां सुनाऊँगी। सोचती हूँ कहानीकार बन जाउंगी।
मैं : अरे। सीधे सीधे मेरे ओहदे पे नज़र। चालाक तो हो तुम कस्तूरी।
क : चालाकी कैसी, आप ही ने तो कहा कि आप केवल शब्द देते हैं विचार हमारे होते हैं। कहानी का सबसे ज़रूरी भाग है कि कहानी सुना कौन रहा है। अगर गांव की एक लड़की की कहानी वह खुद सुना रही है, तो लोग सुन्ना नहीं चाहते। मगर वही कहानी एक पुरूष सुना रहा है तो लोग अधीर होते हैं जानने के लिए कि लेखक के क्या विचार हैं उस लड़की को लेकर। अब अगर कहानी भी मेरी है, कहानी के किरदार भी मेरे है, विचार भी मेरे और शब्द भी मेरे हैं। इन्हें तुम्हारी आवाज़ मिल जाए तो इससे बढ़िया कहानी किसी ने सुनी नहीं होगी पिछले कुछ वक़्त से।

अब आप ही बताइये दोस्त, इससे बढ़िया कहानी सुनी पिछले कुछ वक़्त से?
आपकी कस्तूरी।

© अपूर्वा बोरा

This Post Has 4 Comments

  1. Hari Singh Bora

    Realistic approach for life of growing girls presented by writer in easy conversation.A positive attitude and aptitude.nice.

  2. Aparna

    बहुत अच्छा। दिलचस्प कहानी 👏🏻👍🏻

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