केश सँवारना

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बचपन में
केश सँवारना
एक दिनचर्या
नहीं
युद्ध का
एलान था

कैसे?

कुछ ऐसी
शुरुआत
होती थी
हर
इतवार
सुबह
आठ बजे

पहले बुआ
बालों को
हाथों की
कुशल कंघी 
बना संवारती
और फ़िर
गुनगुने तेल
की ज़ोरदार
या कहें
ज़बरदस्त
चम्पी से
अधखुली आंखों
को दिन भर
के लिए
जगा देती

झन्नाता
हुआ सिर
फ़िर जा
पहुंचता
अम्मा के
अनुभवी हाथों
के पास
जो अब
कछुए सी
धीमी
गति में
एक एक
लट को
सुलझाती

इतने पर भी
यह सिलसिला
थमता नहीं था
कुछ यूँ
समझ लीजिए
कि
हिंदी पिक्चर
में इंटरवल
आया हो

दीये की बाती
से भी ज़्यादा
तेल में भीगे
मेरे सुलझे केश
अब बुआ के
हवाले हो जाते
गुनगुने पानी
से तरा कर
आमला
शिकाकाई
वाले शैम्पू से
फ़िर उन्हें
धोया जाता 
उतने ही
करीने से
सुलझाये गए 
केश
फ़िर एक बार
अपने रौद्र
रूप में
बिखर जाते

“गीला सिर
कभी बांधते नहीं”
अम्मा की
बोली किसी
रेडियो प्रसारण
सी गूंजती
और मैं
चारपाई खींच
आंगन में
ही पसर जाती

गुनगुनी धूप
में जब नींद
के झोंके
मुझे रिझाने
आते तब
अम्मा की
पदचाप सुन
वे भी
चुपचाप
खिसक जाते

फ़िर शुरू
होता सिलसिला
उन बिखरे
जालों को
एक चोटी में
बुनने का

एक छोर
बुआ संभालती
और एक
अम्मा

हर
इतवार की
तरह उस
दिन भी
सवेरे आठ
बजे अलार्म
घनघना उठा
तो मैं समझ गयी

कि इतवार
को अलार्म
नहीं बजा
करता
युद्ध का
बिगुल
बजता है।

 © अपूर्वा बोरा

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