ख़ैर छोड़ो भी

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ख़ैर छोड़ो भी
रात गई सो बात गई

हाँ माना दर्द
के बिस्तर पर
लेटने की आदत
हो गई थी हमें
मग़र फ़िर मखमल
सी उसकी गोद में
सिर रखने का नया
जो तजुर्बा हमें मिला
अब उससे लौटकर
वापस काँटो की शैया
में नींद नहीं आती हमें
आँसूओं से भिगा कर
फ़िर चादर को अपनी
अपने ही हाथों को
तकिया बनाते हैं।
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ख़ैर छोड़ो भी
रात गई सो बात गई
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हाँ माना बिन
पुचकारे नींद के
आगोश में जाने की
आदत हो गई थी हमें
मग़र फ़िर नज़ाकत
से हमारी ज़ुल्फ़ों पर
उनका हाथ फेरने का
नया जो तजुर्बा हमें मिला
अब उससे लौटकर
वापस अपनी उंगलियों से
वो सुकून नहीं मिलता हमें
हथेलियों को आपस में
फ़िर रगड़कर उस गर्मी
से अपने ही सिर को
आराम से सहलाते हैं।
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ख़ैर छोड़ो भी
रात गई सो बात गई
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हाँ माना उसके
जाने के बाद उसकी
हर याद भुलाने की
आदत हो गई थी हमें
मग़र फ़िर अनजाने में
उसका मेरे दिल के
जख्मों को कुरेदने का
नया जो तजुर्बा हमें मिला
अब उससे लौटकर
वापस महफ़िल में अकेला
रह जाना भाता नहीं हमें
सीने को अपने चीरकर
फ़िर उसी लहु से अपनी
ही प्रेम गाथा लिख गैरों को
बेझिझक सुनाते हैं।
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ख़ैर छोड़ो भी
रात गई सो बात गई
कह कर हर रोज़ फ़िर एक
नई गाथा लिख जाते हैं।

© अपूर्वा बोरा​

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