ख़ुद से कह बैठोगे

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किसी दिन मेरे
गुज़रे हुए कल को
अपने कमरे में पलंग
के बगल में रखे गए
नाईट स्टैंड के ऊपर
सजाई गई आसमानी
नीले रंग के जिल्द की
किताब के म्लान पन्नों में
इलायची वाली चाय की
चुस्कियां लेते हुए जब
पढ़ने बैठोगे तो शायद

मेरी गलतियों की लंबी सूची
को अपनी आलोचना भरी
नज़रों के ऊपर समझदारी
का एक पर्दा लगाकर देखोगे
तो कह बैठोगे ख़ुद से ही
“अगर हम ज़िंदगी के किसी
मोड़ पर टकराये होते तो
शायद मैं उसे अपना सकता”

मेरी ख्वाहिशों की दास्तां के
अधूरेपन को मुक़म्मल करने
की कसक बिना झिझक के
बस गले लगा कर देखोगे
तो कह बैठोगे ख़ुद से ही
“अगर हम ज़िंदगी के किसी
मोड़ पर टकराये होते तो
शायद मैं उसे समझ सकता”

मेरी रूह के बिखरे अंश
को अपने अंतर्मन में एक
सिनेमा के पर्दे पर चल रही
कहानी की भांति देखोगे
तो कह बैठोगे ख़ुद से ही
“अगर हम ज़िंदगी के किसी
मोड़ पर टकराये होते तो
शायद मैं उसे थाम सकता”

और यूँ ही किताब के पन्ने
पलटते पलटते मेरी ज़िन्दगी
का अक्स तलाशते तलाशते
कह बैठोगे ख़ुद से फ़िर एक
बार कि “अगर हम ज़िंदगी के
किसी मोड़ पर टकराये होते तो
शायद मैं उससे प्यार कर सकता”

© अपूर्वा बोरा​

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