ख़्वाब

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ख़्वाब के बीज
तो बो दिए हैं
उन बीजों के कोपल
निकलने से लेकर
उनके वृक्ष बनने तक
उस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

जो सामाजिक तानों
की मूसलाधार बरसात
हर दिन हर पहर हर घड़ी
ये माटी का शरीर सहता है
उससे इस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

जो सामाजिक अपेक्षाओं
की प्रबल आंधी
हर दिन हर पहर हर घड़ी
ये माटी का शरीर सहता है
उससे इस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

जो सामाजिक विचारधारा
का उग्र प्रवाह
हर दिन हर पहर हर घड़ी
ये माटी का शरीर सहता है
उससे इस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

जो सामाजिक तानाशाही
का प्रचुर दोगलापन
हर दिन हर पहर हर घड़ी
ये माटी का शरीर सहता है
उससे इस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

ख़्वाब के बीज
तो बो दिए हैं
उन बीजों के कोपल
निकलने से लेकर
उनके वृक्ष बनने तक
उस ख़्वाब की रखवाली
कैसे करूँ?

© अपूर्वा बोरा​

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