किस्सागोई

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पांच बज चुके हैं
चित आकुल है
मन व्याकुल है
दुःस्वप्न था
ये सोचकर
फ़िर आँखें
मूँदने को थे कि
कराह सुन
सब इंद्रिया
जाग उठी
झटपट सिरहाने
के बगल से एक
टॉर्च निकाला गया
और चप्पलें उलटी
पहने सरपट दौड़
लगाई गई
इतने सवेरे किसे
आफ़त जान पड़ी
का चिंतन किये
ज्यों रोशनी डाली
तो पैरों तले ज़मीं
खिसकती नज़र आई
ये तो भीतर थी न
फ़िर यहाँ कैसे
गला सूख गया
आँखें भर आईं
ये ख़ून में लथपथ
माँस का लूथड़ा
हाय मेरी बच्ची
किसने किया
क्या हुआ है तुझे
आंखें खोल
ज़रा देख अपने
बाबा को
देख तो सही
कौन लाया तुझे यहाँ
मुझे ख़बर क्यों न दी
क्या हो गया तुझे
अश्रुधारा अब रोके
न रुकती थी
पीड़ा असहनीय थी
उससे भी असहनीय
था ह्रदय पर आघात
बड़बड़ाते बड़बड़ाते
लोटे के जल से घाव
धोते भी जाते थे
आषाढ़ में तो अठारहवां
वर्ष लगना था इसे
अरे अभी तो नाबालिग़
राम राम
कुछ कहती क्यों नहीं
किस्मत को दुत्कारते
माथा भी पीटते जाते थे
कैसा अभागा बाप है तू
ख़ुद को ही गलियाते थे
अरे कोई आओ ज़रा
उठाने में मदद करो भई
कमर और पैर दोनों ही
जवाब दे गए हैं अब तो
सुनता है कोई
रक्तधारा रोके न रुकती है

क्या हुआ चचा
अरे देख न छोटी को
अस्पताल फ़ोन घुमाता हूँ
तू ज़रा दिखा ला
कहीं ऊंच नीच न हो जाए
जाने कौन ऐसी दशा कर गया
ये कुछ कहती भी नहीं
मेरा तो जी घबरा रहा है
तू ज़रा दिखा ला
रक्तधारा रोके न रुकती है

गुसलखाने क्यों न गई
मेरी जान की दुश्मन बनी है
शुरूआत में ऐसे ही होता है
बन गया न बात का बतंगड़
क्या जल्दी थी भागने की
मैं कर देता न सब ठीक
तेरी हड़बड़ी से देख क्या हुआ
बेकार ही चचा को अटैक आ जाता
फ़िर क्या करती बोल

रक्तधारा रोके न रुकती है
घड़ी के चार बज रहे थे
भैया का फ़ोन आया था
तबियत कुछ ठीक नहीं
ज़रा पट्टी करने आना
किवाड़ का सांकल खोल
दबे पाँव बाहर निकली
पहुंची निचली मंज़िल
तो किसी ने मुँह कसकर
बंद किया और तेज़ झटके
से कमरे में खींच लिया
एक हाथ से मुँह बंद रखा
एक हाथ से दोनों कलाइयों
को सिर के पीछे धकेल दिया
आंखों का सैलाब रोके न रुकता था
और न रुकता था कुछ और भी
घड़ी की टिक टिक सुनाई पड़ती है
असहनीय पीड़ा का समंदर घर कर गया
और यकायक सब शून्य हो गया
चमचमाते फ्लैश का आभास जब तक हुआ
तब तक देर हो चुकी थी
ख़तरे का आभास जब तक हुआ
तब तक देर हो चुकी थी
रक्तधारा रोके न रुकती थी
शायद अब बहुत देर हो चुकी थी

© अपूर्वा बोरा​

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