कोई

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ठोकर खा कर गिर गया हूँ, कोई तो अपना हाथ बढ़ा दो
रास्ता भटक गया हूँ, मुझे कोई घर की राह दिखा दो।

जो सवाल गहराये हैं भीतर, कोई उनके जवाब सुझा दो
उलझनों से जूझ रहा हूँ, मुझे कोई समाधान बूझा दो।

पराया हो कर भी अपना लगूँ तो, कोई प्यार से बुला दो
अकेले सफ़र कर रहा हूँ, मुझे कोई साथी से मिला दो।

धूप बदन झुलसाने लगे तो, कोई बादलों को रुला दो
छाया की तलाश में हूँ, मुझे कोई जुल्फों में छिपा दो।

नींद से मेरे बैर की ख़ातिर, कोई मीठी लोरी सुना दो
बेचैन हो रहा हूँ, मुझे कोई सुकून से गले लगा दो।

सांझ एक कप में भर कर, कोई उसकी घूँट पिला दो
जीने का स्वाद भूल रहा हूँ, मुझे कोई याद दिला दो।

उम्मीद की किरण जगा, कोई मन का अंधकार मिटा दो
ज़िन्दगी से हार रहा हूँ, मुझे कोई ये जंग जिता दो।

ठोकर खा कर गिर गया हूँ, कोई तो अपना हाथ बढ़ा दो
रास्ता भटक गया हूँ, मुझे कोई घर की राह दिखा दो।

© अपूर्वा बोरा​

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