कोरे जज़्बात

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कई दिन
गुज़रने के बाद
फ़िर एक बार
आज उसने
कलम दवात
उठा अपने
अंतर्मन के
शोर को
ह्रदय की
पीड़ा को
कोरे कागज़
पर उतारना
चाहा था

बेहतर शब्दों
की खोज में
सूरज उदय
हो ढल गया
और घटते रहे
रात के जाने
कितने पहर
मग़र उसके मन
और ह्रदय के
इस सैलाब को
वो शब्दों में
पिरो नहीं
पाया था

कई ख़ाके
बनाने के बाद
भी उसकी
रचनायें उसे
रत्ती भर का
सन्तोष न दे
सकीं और
उनका भाग्य
कमरे के कोने
में बिखरे कागज़
के अंबार पर बनी
सिलवटों से जा
मिला था

न जाने कितने
किस्से बीच में
छोड़ दिए न जाने
कितनी कविताएं
अधूरी रहने दीं
अपने जज़्बात
से इंसाफ न
कर सका है
सोचते सोचते
थम गया वो
कि नियति का
आखिर ये कैसा
सिला था

कई दिन
गुज़रने के बाद
फ़िर एक बार
आज उसने
कोरे कागज़
पर अपने
अंतर्मन के
शोर को
ह्रदय की
पीड़ा को
उतारने का
सफ़ल प्रयास
किया था

जब मैं
उसके कमरे
में गई तो
यही देखा
कि कोरा
कागज़ ज्यों
का त्यों ही
पड़ा था
शायद उस
लेखक के
मन और
ह्रदय का
हाल भी कुछ
वैसा ही था

सादा
ख़ाली
रिक्त
शून्य
कोरा

उस कागज़
को देखते
देखते मैं
सोच में पड़
गई कि ये
कैसे कोरा
जज़्बात थे
जिसने एक
कहानीकार
को ख़ामोश
कलम को
निःशब्द कर
दिया था

© अपूर्वा बोरा​

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