कोशिश

इस ज़िंदगी के जो उलझे हुए धागे हैं
इन्हें सुलझाने की,
कोशिश तो कर।

जिस समाज की बेड़ियों में कैद है तू
उससे आज़ाद होने की,
कोशिश तो कर।

कच्चा सा पक्का सा जो रास्ता है तेरी मंज़िल तक
इस ओर कदम बढ़ाने की,
कोशिश तो कर।

ये जो झरोखों से झांकते हैं
इनके ख़्वाब पूरा करने की,
कोशिश तो कर।

ये जो होठों की दहलीज़ पर शब्द हैं
इन्हें ज़ुबान पर लाने की,
कोशिश तो कर।

ये जो मुट्ठियों में बंद जुनून है
इसे आज़माने की,
कोशिश तो कर।

इन धागों को पिरोकर
इन बेड़ियों को तोड़कर
इस पथ पर आगे बढ़कर
इन सपनों को छूकर
इस ख़ामोशी को आवाज़ देकर
तू जुनून की आज़माइश कर

और कोई भी कठिनाई आए

तू फिर एक बार
कोशिश तो कर

 © अपूर्वा बोरा

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