क्रोध

मेरी आँखों के आँसुओं को
सावन की बूंदें न समझना
रिमझिम फुहार न समझना
काले बादलों की तरह उमड़ती हूँ
मैं क्रोध में बरसती भी हूँ

मेरे होठों से निकली ना को
हाँ की गुंजाइश न समझना
अनकही अनुमति न समझना
बिजली की तरह कौंधती हूँ
मैं क्रोध में गरजती भी हूँ

मेरे कपड़ों के विकल्प को
चरित्र का प्रमाणपत्र न समझना
खुला किवाड़ न समझना
सिंहनी की तरह झपटती हूँ
मैं क्रोध में दहाड़ती भी हूँ

मेरी बरसों की खामोशी को
कमज़ोरी न समझना
मदद की गुहार न समझना
औरत की तरह लड़ती हूँ
मैं क्रोध में ललकारती भी हूँ

मेरी क्रोध को
शीशा न समझना
कांच का टुकड़ा न समझना
आईने की तरह इतराती हूँ
मैं समाज को उसकी झलक दिखाती हूँ

 © अपूर्वा बोरा

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