कुछ मेरे जैसी​

सुकून तलाशती फिरती हैं
ये रातों भी कुछ मेरे जैसी हैं

उम्मीदों का दामन फैैैलाये रहती हैं
ये रोशनी भी कुछ मेरे जैसी है

बारिशों में यादें संजोके रखा करती हैं
ये मिट्टी की खुशबू भी कुछ मेरे जैसी है

थमना नहीं है मानो यही कहा करती है
ये हवाएँ भी कुछ मेरे जैसी हैं

धीमी आँच से तेज़ चूल्हे में बनती रहती है
ये कटिंग वाली चाय भी कुछ मेरे जैसी है

पुराने किस्से ताज़ा कर जाती हैं
ये चिट्ठियाँ भी कुछ मेरे जैसी हैं

बेगानों को अपनाया करती हैं
ये सिगरेट भी कुछ मेरे जैसी है

पल में पिघल जाया करती है
ये मोमबत्ती भी कुछ मेरे जैसी है

शतरंज की बिसात बिछाती है
ये ज़िन्दगी भी कुछ मेरे जैसी है

जुनून के रंग में रोज़ाना रंगती है
तुम्हारी मोहब्बत भी कुछ मेरे जैसी है

 © अपूर्वा बोरा

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